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यह एक गैर-WLC लेख है। बाहरी लेखकों के संसाधनों का उपयोग करते समय, हम केवल उस सामग्री को प्रकाशित करते हैं जो बाइबिल और WLC के वर्तमान बाइबिल विश्वासों के साथ १००% मेल खाते हैं। तो इस तरह के लेखों को सीधे WLC के तरफ से आने जैसे माना जा सकता है। याहुवाह के बहुत से सेवकों की सेवकाई से हमें बहुत आशीष मिली है। लेकिन हम अपने सदस्यों को इन लेखकों द्वारा लिखी गई अन्य लेखों को पढ़ने की सलाह नहीं देते हैं। ऐसे लेखों को हमने अपने प्रकाशनों से बाहर रखा है क्योंकि उनमें त्रुटियां हैं। दुख की बात है कि हमें अभी तक ऐसा संस्था नहीं मिला है जो त्रुटि रहित हो। यदि आप गैर-WLC के प्रकाशित सामग्री [लेख/एपिसोड] से चकित होते हैं, तो नीतिवचन ४:१८ को ध्यान में रखें। उसके सत्य के बारे में हमारी समझ बढ़ रही है, जैसे-जैसे हमारे मार्ग पर अधिक प्रकाश पड़ता है। हम जीवन से भी अधिक सत्य से प्रेम रखते हैं, और जहाँ कहीं भी वह मिलता है, उसकी खोज करते हैं।
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शैतान द्वारा मानव जाति पर थोपा गया एक प्रमुख झूठ यह विश्वास है कि मृत्यु के बाद एक व्यक्ति की आत्मा स्वर्ग चली जाती है। बहुत से लोग मानते हैं कि ‘याहुवाह का राज्य’, ‘स्वर्ग’ शब्द का पर्याय है। फिर भी, बाइबल सिखाती है कि जब याहुशुआ मसीह वापस आएंगे, तो याहुवाह का राज्य पृथ्वी पर स्थापित होगा!
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बाइबिल सिखाती है की जब याहुशुआ मसीह लौटेंगे, तो याहुवाह का राज्य की स्थापना धरती पर होगी!
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सबसे पहले, ध्यान दें कि कैसे बाइबल मृत्यु के बाद “स्वर्ग जाने” की धारणा का पूरी तरह से खंडन करती है। पिन्तेकुस्त के दिन पतरस भीड़ से कहता है “हे भाइयो, मैं उस कुलपति दाऊद के विषय में तुम से साहस के साथ कह सकता हूं कि वह तो मर गया और गाड़ा भी गया और उस की कब्र आज तक हमारे यहां वर्तमान है। क्योंकि दाऊद तो स्वर्ग पर नहीं चढ़ा;” (प्रेरितों के काम 2:29,34; HHBD) यह आदमी जो “याहुवाह के मन के अनुसार” है, स्वर्ग में नहीं है, परन्तु अभी भी कब्र में है! हमारे उद्धारकर्ता इसकी पुष्टि यहुन्ना 3:13 में करते हैं : “और कोई स्वर्ग पर नहीं चढ़ा, केवल वही जो स्वर्ग से उतरा, अर्थात मनुष्य का पुत्र जो स्वर्ग में है।”
पुराने और नए नियम के मृत संत अपनी कब्रों में सो रहे हैं, पुनरुत्थान की प्रतीक्षा कर रहे हैं – बिना चेतना के (सभा-उपदेशक 9:5; HINCLBSI) आय्यूब पुनरुत्थान की प्रतिक्षा का विवरण कुछ इस तरह से देता है : “यदि मनुष्य मर जाए तो क्या वह फिर जीवित होगा? जब तक मेरा छूटकारा न होता तब तक मैं अपनी कठिन सेवा के सारे दिन आशा लगाए रहता। तू मुझे बुलाता, और मैं बोलता; तुझे अपने हाथ के बनाए हुए काम की अभिलाषा होती।” (अय्यूब 14:14-15; HHBD)
पवात्रशास्त्र में कई वचन में मृत लोगों को “सोते हुए” लोगों के अर्थ में संदर्भित किया गया है, और यह सादृश्य इस तथ्य से आता है कि जब कोई व्यक्ति गहरी नींद में सोता है, तो कई बेहिसाब घंटे बीत सकते हैं। इसी तरह, जिस समय हम मरेंगे, उस दौरान हमारे पास कोई चेतना, कोई जागरूकता नहीं होगी। हमारे मृत्यु के समय और हमारे पुनरुत्थान के बीच कई वर्ष बीत सकते हैं, लेकिन हमें समय बीतने के बारे में पता नहीं चलेगा। यह ऐसा होगा मानो हमने पलकें झपकाईं और फिर से जीवित हो गए। इस प्रकार, चेतना के दृष्टिकोण से, हमें ऐसा प्रतीत होगा कि मृत्यु और पुनरुत्थान के बीच कई वर्षों के बावजूद, भौतिक शरीर से तुरंत आध्यात्मिक शरीर में चले गए हैं।

कुरिन्थियों को लिखी गई पहली पत्री 15वीं अध्याय में पौलुस सिखाता है कि पुनरुत्थान तब तक नहीं होता जब तक याहुशुआ मसीह वापस नहीं आता – जिस समय पर “मसीह में मृत” आध्यात्मिक शरीर के साथ पुनर्जीवित हो जाएंगे, और जीवित संत “पलक झपकते एक क्षण में ही” आत्मा में बदल दिया जाएंगे। (वचन 52) यदि संतों को मृत्यु के बाद ही स्वर्ग जाना होता, तो पुनरुत्थान की क्या आवश्यकता होती? वचन 53 में, पौलुस कहता है कि “नाशमान देह” को “अविनाशी चोले को धारण कर लेना अनिवार्य है”, (HERV) जिसका अर्थ है कि अब हमारे पास यह नहीं है (रोमियों 2:7 भी देखें)। अब केवल याहुवाह ही अविनाश है (1 तीमुथियुस 6:15-16)
मत्ती 5वीं अध्याय में याहुशुआ कहते हैं की मन के दीन “स्वर्ग के राज्य” प्राप्त करेंगे, जबकि जो नम्र हैं, वे “पृथ्वी के अधिकारी होंगे” (मत्ती 5:3 ; देखिए भजन संहिता 37:11; HHBD) क्या याहुवाह “मन के दीन” संतों को “नम्र” संतों से अलग करके अलग-अलग स्थानों पर भेज देगें? यदि कोई संत नम्र और आत्मा से दीन है, तो क्या उसे स्वर्ग और पृथ्वी विरासत में मिलेंगे? नहीं – यह पहेली तब दूर हो जाती है जब हमें पता चलता है कि मत्ती “स्वर्ग के राज्य” वाक्यांश का उपयोग करता है, जबकि अन्य सुसमाचार लेखक “परमेश्वर (याहुवाह) का राज्य” का उल्लेख करते हैं। “याहुवाह का राज्य” का अर्थ यह नहीं है कि राज्य याहुवाह में स्थित है, बल्कि याहुवाह का है। उसी तरह, “स्वर्ग का राज्य” का अर्थ है कि राज्य का स्वामित्व “स्वर्ग” के पास है, जहां याहुवाह का सिंहासन है। आत्मा में दीन को वही राज्य विरासत में मिलेगा जो नम्र लोगों को मिलेगा – और वह राज्य पृथ्वी पर स्थापित किया जाएगा।
गलातीयों 3:29 यह कहता है कि अगर हम मसीह के हैं, तो हम इब्राहीम के वंश और प्रतिज्ञा चे अनुसार वारिस भी हैं। पुनरुत्थान में इब्राहीम को जो कुछ विरासत में मिलेगा, वह हमें भी विरासत में मिलेगा। उत्पत्ति 13:15 कहता है कि विरासत शाश्वत है, और रोमियों 4:13 बताता है कि वादा पूरे जगत को शामिल करने के लिए विस्तारित है। हालाँकि, “स्वर्ग”, इब्राहीम, इसहाक और याकूब या हम से किए गए वादों का हिस्सा नहीं था।
बाइबिल हमें दिखाता है की याहुवाह का राज्य पृथ्वी पर होगा: और उन्हें हमारे परमेश्वर के लिये एक राज्य और याजक बनाया; और वे पृथ्वी पर राज्य करते हैं। (प्रकाशित वाक्य 5:10 ;HHBD)। प्रकाशितवाक्य 11:15 पर भी ध्यान दें, जो भविष्यवाणी करता है कि मसीह का राज्य इस पृथ्वी के राज्यों पर अधिकार कर लेगा:
सातवें स्वर्गदूत ने तुरही बजायी। इस पर स्वर्ग में वाणियाँ सुनाई पड़ीं, जो ऊंचे स्वर से कह रही थीं :“इस संसार का राज्य हमारे प्रभु और उसके मसीह का राज्य बनगया है।वह युग-युगों तक राज्य करेंगे।” (प्रकाशन 11:15;HINCLBSI)
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कई शताब्दियों की मूर्तिपजा परंपरा ने लोगों को आश्वस्त करवाया है कि स्वर्ग उनका “घर” है और मरने पर उनका इनाम है। फिर भी, बाइबिल स्पष्ट है: याहुवाह का राज्य उनके द्वारा बनाई गई पृथ्वी पर स्थापित किया जाएगा, और यह एक चिरस्थायी राज्य होगा।
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प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में तीन बार, प्रेरित यूहन्ना ने “पवित्र नगर”, नये यरूशलेम का वर्णन किया है, जो स्वर्ग में होने के बजाय स्वर्ग से नीचे आ रही है (प्रकाशितवाक्य 3:12; 21:2, 10)। नयी यरूशलेम, नई – स्वच्छ और शुद्ध – पृथ्वी पर स्थापित किया जाएगा। याहुवाह स्वयं मनुष्यों के साथ वास करेगा – स्वर्ग में नहीं, परन्तु पृथ्वी पर नये यरूशलेम में:
फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा। फिर मैं ने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग पर से परमेश्वर के पास से उतरते देखा, और वह उस दुल्हिन के समान थी, जो अपने पति के लिये सिंगार किए हो। फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊंचे शब्द से यह कहते सुना, कि देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उन के साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उन के साथ रहेगा; और उन का परमेश्वर होगा। और वह उन की आंखोंसे सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं। . . . . . जो जय पाए, वही इन वस्तुओं का वारिस होगा; और मैं उसका परमेश्वर होऊंगा, और वह मेरा पुत्र होगा। (प्रकाशित वाक्य 21:1-4, 7 HHBD)
कई शताब्दियों की मूर्तिपजा परंपरा ने लोगों को आश्वस्त करवाया है कि स्वर्ग उनका “घर” है और मरने पर उनका इनाम है। फिर भी, बाइबिल स्पष्ट है: याहुवाह का राज्य उनके द्वारा बनाई गई पृथ्वी पर स्थापित किया जाएगा, और यह एक चिरस्थायी राज्य होगा। (पृथ्वी पर राज्य की स्थापना के और अधिक उदाहरणों के लिए, देखें भजन संहिता 2:6-8; 47:1-9; यिर्मयाह 23:5; यहेजकेल 37:21-28; दानिय्येल 2:44-45; 7:17-18, 27; मीका 4:1-5; जकर्याह 9:9-10; 14:9, 16-17; प्रकाशितवाक्य 2:26-27)

यह WLC के द्वारा लिखी हुई आलेख नहीं है। मूल आलेख: https://www.truegospel.org/index.cfm/fuseaction/basics.tour/ID/4/Where-Will-Kingdom-Be-Established.htm
हमने मूल लेख से पिता और पुत्र के सभी मूर्तिपूजक नाम और शीर्षक निकाल दी हैं, साथ ही साथ पवित्रशास्त्र के वचनों में भी, उनके असली नामों को वापस बहाल किए हैं। – WLC टीम।
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यह एक गैर-WLC लेख है। बाहरी लेखकों के संसाधनों का उपयोग करते समय, हम केवल उस सामग्री को प्रकाशित करते हैं जो बाइबिल और WLC के वर्तमान बाइबिल विश्वासों के साथ १००% मेल खाते हैं। तो इस तरह के लेखों को सीधे WLC के तरफ से आने जैसे माना जा सकता है। याहुवाह के बहुत से सेवकों की सेवकाई से हमें बहुत आशीष मिली है। लेकिन हम अपने सदस्यों को इन लेखकों द्वारा लिखी गई अन्य लेखों को पढ़ने की सलाह नहीं देते हैं। ऐसे लेखों को हमने अपने प्रकाशनों से बाहर रखा है क्योंकि उनमें त्रुटियां हैं। दुख की बात है कि हमें अभी तक ऐसा संस्था नहीं मिला है जो त्रुटि रहित हो। यदि आप गैर-WLC के प्रकाशित सामग्री [लेख/एपिसोड] से चौंकते हैं, तो नीतिवचन ४:१८ को ध्यान में रखें। उसके सत्य के बारे में हमारी समझ बढ़ रही है, जैसे-जैसे हमारे मार्ग पर अधिक प्रकाश पड़ता है। हम जीवन से भी अधिक सत्य से प्रेम रखते हैं, और जहाँ कहीं भी वह मिलता है, उसकी खोज करते हैं।
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क्या आपने कभी अपने माँ-बाप से पुछा कि वो जो कर रहें हैं, क्यों करते हैं? और बदले में उनका जवाब, “यह परंपरा है” रहा हो? उदाहरण के लिए यह कहानी को ही ले लीजिए: एक छोटी सी बच्ची अपनी माँ को खाना पकाते देख रही थी। उसकी माँ ब्रेड के सिरों को काट कर तल रही थी। वो छोटी बच्ची अपनी माँ से पुछी, “आपने ब्रेड कि सिरों को क्यों काट दिया?” और बदले में उस बच्ची को जो जवाब मिला, वह उस से संतुष्ट नहीं थी। उसकी माँ ने कहा, ” मैं नहीं जानती, मेरी माँ ऐसा ही बनाती थी, और मैं उनसे ऐसे ही सीखी।” तो वो छोटी बच्ची अपनी नानी के पास गई और पुछी कि उन्होंने क्यों ऐसा किया? उसकी नानी ने उसे जवाब में कहा कि वो भी नहीं जानती, उनकी माँ से उन्होंने ऐसा ही सीखा है। छोटी बच्ची, निराश हुए, अपने परनानी के पास गई और पुछी, “अपने क्यों ब्रेड के सिरों को काट दिया?” तो जवाब में उसकी परनानी ने कहा, “मेरे ब्रेड के सिरे सुखे हुए थे, इसलिए तलने से पहले उन्हें काटती थी।”

इसका बाइबिल के साथ क्या संबंध है? सीधी सी बात है। आज मसीही भी यही काम करते हैं। मसीही, आज, “पारंपारीक मसीही” को गिर गए हैं; बड़े नाम पर आधार होना; एक ऐसी परिस्थिति जहाँ लोग जो भी उनसे कहा जाता है बिना पवित्रशास्त्र से तुलना किए, मान लेते हैं। यह भयानक है। आपको क्या लगता है, कि कैसे प्लेटो, लूथर और अगुस्टीन ने धर्म पर इतना प्रभाव डाल पाए? लोगों ने जो सुना था उसे पवित्रशास्त्र के साथ सिद्ध नहीं किया। वे निष्क्रिय और बेवकूफ थे, और, कह सकते, आलसी भी थे!
अगर हम पवित्रशास्त्र का अध्ययन नहीं करते, तो हम शैतान के धोखे में गिर जाएँगे जो हमारे साम्हने रखे हैं। शैतान, इस युग का भगवान, के अपने तरीके हैं धोखा देने के लिए। और मसीही विश्वास के लोगों के संबंध में उसका बडा अस्त्र परंपरा है। बीज बोने वाला के दृष्टान्त में (मत्ती १३, लूका ८) हमें बताया गया है कि शैतान उन पर हमला करता है जो रास्ते के किनारे पर गिरे हुए हैं, और उद्धार के वचन को उनमें से ले जाता, ताकि वे सुसमाचार पर विश्वास न कर पाएँ, जिस प्रकार से याहुशुआ ने शिक्षा दी है। (देखिए लूका ८:१२)। सच में, शैतान का मुख्य उद्यश्य है कि वह याहुशुआ को उनके शिक्षा से अलग करें। हमें हमेशा चौकन्ना रहना चाहिए, और जो हमें सीखाया जा रहा उसे पवित्रशात्र से तुलना (मिलाकर देखना) करना चाहिए!
प्रेरितों के काम १७:११ में, हम लोगों की एक समूह के बारे में पढते हैं, बिरीया के लोग, जो प्रतिदिन पवित्र शास्त्रों में ढूँढ़ते रहे कि जो बातें पालुस सिखा रहा था, सच है कि नहीं। हालांकि, बिरीया के लोग, पौलुस को गलत साबित करने कि उद्देश्य से पढ़ रहे थे, लेकिन उनकी सच्ची मेहनत और पौलुस की सच्चाई, उन सब का विश्वासी होने में परिणाम हुआ।
कौन से भ्रम चर्च में अब तक अपना रास्ता बना लिए? स्वर्ग एक ऐसी जगह है जो शरीर से अलग हुए आत्माओं के लिए है। बाइबिल में, कहीं भी यह नहीं कहता, जब हम मर जाते, स्वर्ग को जाएँगे। अब्राहाम [अब्राहम], इसहाक, याकूब, और दाऊद को स्वर्ग में बादल या कुर्सी या कोई पद वादा नहीं किया गया बल्कि, यहाँ, धरती पर, राज्य, जमीन, वारिस, और राज्याधिकार का वादा किया गया है। (मत्ती ५:५, प्राकाशितवाक्य ५:१०) याहुवाह ने उनके साथ वाचा बनाया कि उनका राज्य हमेशा
के लिए स्थापित होगा और नई पृथ्वी में उनका अपना जमीन होगा। हालाँकि, विशिष्ट “अच्छा महसूस” करने वाली संदेश अब इस विषय को शामिल नहीं करता है, क्योंकि किसी को यह बताना आसान है कि जब वे मरेंगे तो वे कब्र (शीओल) में सोने के बजाय स्वर्ग जाएंगे जब तक कि मसीह वापस नहीं आ जाता। इस सीधी-सी कथन “क्योंकि जीवते तो इतना जानते हैं कि वे मरेंगे, परन्तु मरे हुए कुछ भी नहीं जानते. . .” (सभोपदेशक 9:5 HINDI-BSI) से आँख बंद कर लेना आसान है और यह विश्वास करने के लिए चुनना आसान है कि मरे हुए स्वर्ग या नरक में पूरी तरह से अभिज्ञ है। यह आसान है क्योंकि यह पारंपारिक है।
और यह भी कहना कि याहुवाह तीन है, अनर्थक है! कहाँ हम बाइबिल में पढ़ते हैं कि याहुवाह तीन व्यक्तियाँ हैं? कहीं भी नहीं। लेकिन ऐसे कई वचन हैं जो कहते हैं, कि याहुशुआ, याहुवाह का पुत्र है। यहुन्ना ३:१६ में हमें यह सीखाया जाता है कि वह [याहुवाह] जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया। व्यवस्थाविवरण ६:४ (HINDI-BSI) कहता है: “हे इस्राएल, सुन, याहुवाह हमारा एलोआह है, याहुवाह एक ही है।” इसलिए याहुवाह दो या तीन नहीं हो सकता। याहुवाह एक ही है और वह याहुशुआ के द्वारा हम में काम करता है।
१ कुरुन्थियों १५:३-४ सुसमाचार को परिभाषित करने के लिए महत्वपूर्ण वचन हैं। लेकिन, यह वचन उन कई दूसरे वचनों से अलग नहीं किया जाना चाहिए जो सुसमाचार को परिभाषित करते हैं। पौलुस “पहले महत्व” होने वाले तीन चीजों को सूचीबद्ध कर रहा था। और पौलुस निश्चय ही राज्य को सुसमाचार से निकाल कर अलग नहीं कर रहा था। लूका ४:४३ में याहुशुआ हमें बताते हैं कि उन्हें क्यों बेजा गया है: सब को राज्य का सुसमाचार प्रचार करने के लिए (मत्ती २८: १९,२०) मसीही आज नज़र अंदाज कर रहे जो याहुशुआ ने लूका ४:४३ में बताया था। चर्च में राज्य का विषय को ज्यादा एहमीयत नहीं दी जाती । परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार को खुशी से प्रचार करने पर ध्यान देने के बजाय, मसीही, लोगों को सिर्फ यह बताने पर ध्यान देते हैं कि याहुशुआ का मृत्यु हुआ और वह फिर से जी उठा।
यह सीधी सी बात है कि याहुवाह सिर्फ क्रूस पर मरने के लिए नहीं भेजा गया, जैसे हम सन्डे स्कूल या चर्च में से सीखे हैं। बल्कि वह तो याहुवाह के राज्य का सुसमाचार सब को बोलने के लिए भेजा गया था (मार्कुस १: १४,१५), ताकि हम पछताकर, समझकर और विश्वास करते हुए तैयार रहें। याहुशुआ पहले बहुत समय तक प्रचार किए थे, बाद में उनके राज्य के सुसमाचार के संदेश में उनकी मृत्यु और उनका पुनुरुथान के बारे में अधिक जानकारी भी शामिल किया (मत्ती १६;२१) ।
अगर हम मसीह के अनुयायी बनना चाहते हैं, क्या हम भी वही संदेश को सीखाना नहीं चाहिए जिसे याहुशुआ ने लगातार सुसमाचार को प्रचार करने के कार्य में लगा हुआ था?
यह WLC के द्वारा लिखी हुई आलेख नहीं है। यह आलेख मिरींडा बाल्डविन द्वारा लिखी गई है।
हमने मूल लेख से पिता और पुत्र के सभी मूर्तिपूजक नाम और शीर्षक निकाल दी हैं, साथ ही साथ पवित्रशास्त्र के वचनों में भी, उनके असली नामों को वापस बहाल किए हैं। – WLC टीम।
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उद्धार एक उपहार है, लेकिन उस उपहार को प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए स्वीकार करना होगा। कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे के लिए उद्धार स्वीकार नहीं कर सकता; कोई किसी और के लिए समर्पण नहीं कर सकता।
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किसी पति और पत्नी के बीच ठीक से संपर्क न होना विवाद पैदा करने से ज्यादा हो सकती है। इसके विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। २०११ में, सभी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर विमान चालक और हवाई यातायात नियंत्रकों द्वारा दुनिया भर में उपयोग की जाने वाली भाषा के रूप में अंग्रेजी को अपनाया गया था। हालांकि, डॉ डामिनिक ऐस्टिवॉल, एक आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय के भाषाविद जोकि विमान चालक और प्राशिक्षक भी हैं, इनके अनुसार, ठीक से संपर्क न होने के कारण से विमान दुर्घटनाओं में २००० से अधिक लोगों की मृत्यु सन् १९७० से हुई है।1
जितना दुखद इसके परिणाम हैं, कई लोग फिर भी, अनजाने में, एक ऐसी ही गलती – अपने आत्मिक ज़िंदगी में कर रहे हैं। वे अपनी उद्धार की जिम्मेदारी अपने प्रचारक, या आत्मीय गुरुओं को सौंप रहे हैं।
अनुरूपता के लिए प्रतिबद्ध
यह अनजाने में शुरू होता है। एक छोटी बच्ची को उसके माँ-बाप द्वारा सिखाई जाती है कि यीशु उससे प्यार करता है। एक युवा को उसके परिवार के विशेष संस्था के सिद्धांतों के खास स्कूल में निर्देश दिया जाता है। बचपन से ही, उन्हें क्या विश्वास करना सिखाया जाता है, लेकिन सच्चाई को खुद के लिए ढूँढना की जिम्मेदारी नहीं सिखाया जाता है। यही उनके आगे के ज़िंदगी में भी लागू होता है। हर रविवार या शनिवार को, दुनिया के अधिक्तर २४० करोड ईसाई चर्च जाते हैं, अपने पुजारी, पास्टरो पर यह भरोसा करते हुए कि वे उन्हें बताऐंगे कि बचाये जाने के लिए उन्हें क्या जानना चाहिए।
समस्या यह है कि वे अपनी व्यक्तिगत, आत्मीय उद्धार की ज़िम्मेदारी को किसी दूसरे को सौंप रहे हैं। कई पादरी, प्रचारक याहुवाह से प्यार तो करते हैं, लेकिन उनका पहली निष्ठा उस संस्था संगठन को है जो उनको वेतन देते हैं। इस प्रकार, कई लोग सत्य को अस्वीकार कर देते हैं जब वह सत्य उनके संस्थाओं के सिद्धांतों का खंडन करता है।
यहुन्ना ने घोषित किया: तब मुझे एक अन्य शब्द सुनाई दिया: “ ‘मेरी प्रजा उस नगरी से बाहर निकल आओ कि तुम,’ उसके पापों में उसके सहभागी न बनो कि, उसकी विपत्तियां तुम पर न आ पड़ें। उसके पापों का ढेर स्वर्ग तक आ पहुंचा है। परमेश्वर ने उसके अधर्मों को याद किया है। (प्रकाशित वाक्य १८:४-५; सरल हिन्दी बाइबिल)। यह गंभीर आदेश सब के लिए है। कोई भी एक समुदाय छूटा नहीं है।

उद्धार एक व्यक्ति की व्यक्तिगत मामला है
नबी यहेजकेल के द्वारा, याहुवाह ने एक व्यक्ति के व्यक्तिगत आत्मीय जिम्मेदारी को किसी और के हाथों में सौंपने के खतरों के बारे में गंभीर चेतावनी दी थी।
तब यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा, “हे मनुष्य के सन्तान, जब किसी देश के लोग मुझ से विश्वासघात करके पापी हो जाएँ, और मैं अपना हाथ उस देश के विरुद्ध बढ़ाकर उसका अन्नरूपी आधार दूर करूँ, और उसमें अकाल डालकर उसमें से मनुष्य और पशु दोनों का नाश करूँ, तब चाहे उस में नूह, दानिय्येल, और अय्यूब ये तीनों पुरुष हों, तौभी वे अपने धर्म के द्वारा केवल अपने ही प्राणों को बचा सकेंगे;’ याहुवाह एलोआह की यही वाणी है।
यदि मैं किसी देश में दुष्ट जन्तु भेजूँ जो उसको निर्जन करके उजाड़ डालें, और जन्तुओं के कारण कोई उसमें होकर न जाए, तो चाहे उसमें वे तीन पुरुष हों, तौभी , याहुवाह एलोआह की यह वाणी है, मेरे जीवन की सौगन्ध, न वे पुत्रों को और न पुत्रियों को बचा सकेंगे, वे ही अकेले बचेंगे; परन्तु देश उजाड़ हो जाएगा।
यदि मैं उस देश पर तलवार खींचकर कहूँ, ‘हे तलवार उस देश में चल;’ और इस रीति मैं उस में से मनुष्य और पशु नष्ट करूँ, तब चाहे उसमें वे तीन पुरुष भी हों, तौभी याहुवाह एलोआह की यह वाणी है, मेरे जीवन की सौगन्ध, न तो वे पुत्रों को और न पुत्रियों को बचा सकेंगे, वे ही अकेले बचेंगे।
यदि मैं उस देश में मरी फैलाऊँ और उस पर अपनी जलजलाहट भड़काकर उसका लहू ऐसा बहाऊँ कि वहाँ के मनुष्य और पशु दोनों नष्ट हों, तो चाहे नूह, दानिय्येल और अय्यूब भी उसमें हों, तौभी, याहुवाह एलोआह की यह वाणी है, मेरे जीवन की सौगन्ध, वे न पुत्रों को और न पुत्रियों को बचा सकेंगे, अपने धर्म के द्वारा वे केवल अपने ही प्राणों को बचा सकेंगे। (यहेजकेल १४:१२-२०; HINDI-BSI)
एक व्यक्ति दूसरे के लिए आत्मसमर्पण नहीं कर सकता है। उद्धार एक उपहार है, लेकिन उस उपहार को प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए स्वीकार करना होगा। एक पति अपने पत्नी के लिए उद्धार स्वीकार नहीं कर सकता; एक बड़े बच्चे के लिए उसके माँ-बाप उद्धार स्वीकार नहीं कर सकते। और न ही एक प्रचारक किसी के लिए भी उद्धार स्वीकार नहीं कर सकता सिवाय उस प्रत्येक व्यक्ति के।
गुरुओं का खतरा

गुरु, हिंदू धर्म के निजी धार्मिक नेता हैं। दुःख की बात है, कि कई मसीही अपने प्रचारक को निजी गुरु के तौर पर बदल देते हैं। वे नई सच्चाई को एक खुले मन से स्वीकार करने को इनकार करते हैं। वे मान लेते हैं, कि अगर उन्हें कुछ और जानने की जरूरत हो, तो उनके गुरु उन्हें बता देंगें। अगर उनके धार्मिक नेता किसी नई बात को नकारते हैं, तो, वे भी उस बात को बिना खुद पढ़े नकारते हैं। यही खतरा है, किसी और पर भरोसा करने का, कि वे आपके लिए तय करें कि क्या सच है।
अपने प्रचारक (पाॅस्टर) को अपना आत्मीय गुरु बनाना, आपको याहुवाह के सामने इस जिम्मेदारी से छूट नहीं देता कि आप खुद के लिए अध्ययन न करें। आप बाइबिल अध्यापकों, प्रचारकों, पाॅस्टरों, इमाम, गुरुओं या रब्बी पर निर्भर नहीं हो सकते आपको यह कहने के लिए कि क्या यकीन करना है और क्या नहीं। आपको खुद के लिए पढ़ना होगा।
जब आप, अपने आप के लिए पढ़ते हैं, तो याहुवाह की आत्मा आपका अध्यापक बनेगा। याहुशुआ ने अपने मृत्यु से पहले कहा: “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आने वाली बातें तुम्हें बताएगा।” (यहून्ना १६:१२-१३; HINDI-BSI)
जब याहुवाह की आत्मा आपका अध्यापक है तो आप सच में इतना दृढ़ रहेंगे कि आपको कोई भ्रमित नहीं कर सकता। आप विश्वास में बहुत दृढ़ होंगे, परिणाम स्वरूप, शैतान के अंत-समय के धोखों से आप सुरक्षित रहेंगे। लेकिन अगर आप कुछ विश्वास करते हैं क्योंकि किसी ने आपको बताया क्या विश्वास करना है, तो आप कमजोर रहेंगे। कोई भी दूसरा व्यक्ति आ सकता है, और अगर वह वाकपटुता में निपुण हुआ तो वह आपके विश्वासों को बदल सकता है।
खुद के लिए पढ़ें!
शैतान लोगों को खुद के लिए पढ़ने से डराता है। वो उन्हें बताता है कि बाइबिल समझना कठिन है और बड़े विद्वान जिनके पास कई डिग्री है, सिर्फ वे समझ सकते हैं। लेकिन यह झूठ है! बाइबिल साधारण मानव के लिए लिखा गया था!
पौलुस ने तीमुथियुस को प्रोत्साहित किया: “अपने आप को याहुवाह का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करनेवाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्जित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो।” (२ तीमुथियुस २:१५; HINDI-BSI) उसने दुनिया के सबसे उत्तम शिक्षक को ढूँढने के लिए, या किसी प्रचारक के चरणों में बैठने के लिए नहीं कहा।
यशायह के द्वारा, याहुवाह ने एक अद्भुत आमंत्रण को बढ़ा दिया: “आओ, हम आपस में वाद-विवाद करें” (यशायाह १:१८; HHBD) यह याहुवाह की प्रतिज्ञा है कि, सत्य समझने के लिए आपको किसी भी तरह की प्रमाण या सबूत की आवश्यकता हो, तो, वह आपको प्रदान करेगा।
अपने उद्धार को किसी और को न सौंपें, न ही आपके प्रचारक, या पास्टर को, या अपने पति या पत्नी को।
उद्धार एक उपहार है जिसे आप खुद अपने लिए स्वीकार करना होगा।
1 “विमान चालकों और हवाई यातायात नियंत्रकों के बीच गलत संचार के घातक परिणाम।,” retrieved १२-०८-२०१९।
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याहुवाह के पास आने के लिए आपको तब तक इंतजार करने कि जरूरत नहीं है जब आप पाप करना छोड़ दिया हो। अब ही आ जाइए। आप जैसे हैं वैसे ही, क्योंकि वह पापियों को स्वीकार करता है!
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मेरे पास एक समाचार है! सुनना चाहते हैं? क्या आप तैयार हैं?
क्या आप वाकइ मैं तैयार है?
तो अच्छी खबर यह है. . . कि . . .आप पापी है !

शायद आप यह नहीं सुनना चाहते थे। लेकिन सच में! यह खुश खबर है, क्योंकि याहुशुआ के द्वारा, याहुवाह पापियों को स्वीकार करता है !
बस पापियों के लिए उपहार
सुसमाचार की अच्छी खबर है कि, हालांकि, पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु याहुवाह का वरदान याहुशुआ में अनन्त जीवन है। (देखिए रोमियों ६:२३)। याहुवाह चाहते हैं कि सब बचे लेकिन सच्चाई यह है कि, याहुशुआ केवल पापियों के लिए मर गए। हर मसीही जानता है कि सब ने पाप किया है और याहुवाह की महिमा से रहित हैं। इसलिए, हम यह मान लेते हैं कि वह सब के लिए मर गए। जबकि, याहुशुआ केवल पापियों के लिए मर गए।
यह शायद तुच्छ लग सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है। याहुशुआ के समय के फरीसियों ने स्व-घोषित धार्मिकता पर गर्व किया। याहुशुआ मत्ती को चेला बनने के लिए बुलाने के बाद, मत्ती ने उद्धारकर्ता के लिए एक दावत दिया जिसमें उसने कई महसूल लेने वाले और अन्य लोगों को भी बुलाया था।
इस पर फरीसी और उनके शास्त्री उस के चेलों से यह कहकर कुड़कुड़ाने लगे,
“तुम चुंगी लेनेवालों और पापियों के साथ क्यों खाते-पीते हो?”
याहुशुआ ने उनको उत्तर दिया, “वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये आवश्यक है। मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूँ।”
(देखिए लूका ५:३०-३२; HINDI-BSI)
दूसरे शब्दों में, याहुशुआ कह रहे थे, “अगर तम्हें मेरी आवश्यकता नहीं हैं, तो जान लो मैं तुम्हारे लिए नहीं आया। मैं पापियों के लिए आया हूँ।”
मसीही आज बड़ी आसानी से पापी होने को स्वीकारते हैं। लेकिन कितने लोग सही अर्थ में इसको बोलते हैं? कितने लोग ऐसे बोलते हैं क्योंकि बस उनसे यह कहने कि उम्मीद है? सच यह है, कई मसीही अपने आप को दूसरों के साथ तुलना करते हैं, और दूसरों कि कमियाँ ढूँढते हैं। “हाँ” कहते वो, “मैं पापी हो सकता हूँ, लेकिन . . . मैं वहाँ रहने वाले व्यक्ति जैसे नहीं हूँ। मैं अपने खाने कि खयाल रखता/रखती हूँ: मैं ज्यादा मिठास नहीं खाता/खाती हूँ, और सुअर की माँस तो कभी मेरे ओंठ के पास तक भी आया नहीं है। हाँ, शायद मैं ज्यादा चलचित्र देखता/देखती हूँ, लेकिन जो मूवीज़ मैं देखता/देखती हूँ उसमें मार-पीठ ज्यादा नहीं होती, और नग्न चलचित्र तो मैं देखता/देखती ही नहीं। मसीही के साथ के रिश्ते में मैं काफी अच्छा कर रहा/रही हूँ!”

और इस तरह दूसरों के साथ अपने आप की तुलना करके, वे खुद ही निर्णय करते हैं कि उनका अपना पाप सच में उतना बुरा नहीं है।
याहुशुआ पापियों को बचाने के लिए मर गए। याहुवाह उनको बचाना चाहते हैं जो अपने पाप को ठुकराते हैं पर वे मसीह को स्वीकार नहीं करते। सिर्फ पापी मसीह के पास आ सकते हैं। अपने आप को धार्मिक समझने वाले नहीं आ सकते, क्योंकि, याहुशुआ के पास आने के लिए पहले उनको कबुल करना होगा कि वे पापी हैं और उद्धारकर्ता की आवश्यकता है। अपने आप को धार्मिक समझने वाला व्यक्ति सोचता है कि उसमें कोई पाप नहीं है, तो किस बात से पश्चताप करना है? सिर्फ वो व्यक्ति जो कबुल करता है कि वह पापी है और वो खुद को बचा नहीं सकता, विश्वास से उद्धार के लिए याहुशुआ कि योग्यता पर भरोसा करता है। इसलिए, याहुशुआ कि मृत्यु सब के लिए होने के बावजूद, याहुवाह सिर्फ पापियों को स्वीकार करता है।
बुरी खबर का प्रोत्साहन!
कोई भी यह स्वीकार करना पसंद नहीं करता है कि उसके आंतरिक विचार कितने भ्रष्ट हैं या उसने कितनी बार पश्चाताप किया है, लेकिन फिर भी एक ही पाप को बार-बार किया। लेकिन अगर आप पापी हैं, यह अच्छी खबर है! अगर याहुवाह पापियों को स्विकार करता है, वह आपको भी स्वीकार करेगा! याहुवाह सिर्फ उन्हें स्वीकार नहीं करता जो सिर्फ अपने होंठ से कबुल करते हैं कि वे पापी हैं बस इसलिए क्योंकि उनसे ऐसे कहने कि उम्मीद की जा रही। लेकिन उन सब के लिए जो सच में पापी हैं, जो खोया हुआ और निराश महसूस करते हैं, याहुवाह उनको स्वीकारेगा।

पापियों को याहुवाह के पास उद्धार के लिए आने की प्रोत्साहन करने के लिए याहुशुआ ने एक दृष्टान्त बताया जो स्वीकार किए जाने के शर्तों अच्छे से दर्शाते हैं।
और वह यह दृष्टान्त कहा उनके लिए जो अपने आप पर विश्वास करते हैं और खुद को धार्मिक मानते हैं और दूसरों को तुच्छ मानते हैं: “दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने के लिये गए; एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेनेवाला। फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यों प्रार्थना करने लगा, ‘हे याहुवाह, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि मैं दूसरे मनुष्यों के समान अन्धेर करनेवाला, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेनेवाले के समान हूँ। मैं सप्ताह में दो बार उपवास रखता हूँ; मैं अपनी सब कमाई का दसवाँ अंश भी देता हूँ।’ “परन्तु चुंगी लेनेवाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आँखें उठाना भी न चाहा, वरन् अपनी छाती पीट-पीटकर कहा, ‘हे याहुवाह, मुझ पापी पर दया कर!’ मैं तुम से कहता हूँ कि वह दूसरा नहीं, परन्तु यही मनुष्य धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा। ” (लूका १८:१०-१४; HINDI-BSI)
शायद आप भय से भरे हुए हैं। आप सोच सकते हैं कि आप बहुत गिरे हुए हैं, या एक ही पाप बहुत बार किए की आप माफी के लायक नहीं हैं। लेकिन अगर ऐसा है, आप ही वह व्यक्ति है जिसे याहुवाह पुकार रहे हैं! जब तक आप अपने जीवन में पाप पर विजय प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक आपको यहुवाह से दूर रहने की आवश्यकता नहीं है। आप जैसे हैं, वैसे ही आ सकते हैं, वह आपको स्वीकार करेगा।
आपके लिए याहुवाह का निमंत्रण है : “हे भटकनेवाले बच्चों, लौट आओ, मैं तुम्हारा भटकना सुधार दूँगा। देख, हम तेरे पास आए हैं; क्योंकि तू ही हमारा परमेश्वर यहोवा है। (यिर्मयाह ३:२२; IRV-HIN) जितना कम और अधिक असहाय आप स्वयं को जानते हैं, उतना ही अधिक आप विश्वास कर सकते हैं कि वह आपको स्वीकार करेगा क्योंकि उसने कहा कि वह करेगा: ” जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।” (यूहन्ना ६:३७; HINDI-BSI)
याहुवाह के पास आने के लिए और प्रतिक्षा न करें। याहुवाह के पास आने कि इच्छा जो आपके हृदय में है, उन्होंने खुद आपके दिल में वो इच्छा डाली है। आप निश्चय ही विश्वास कर सकते हैं कि याहुवाह आपको स्वीकार करेगा क्योंकि उन्होंने आपसे पहले कई और लोगों को स्वीकारा है: पियक्कड़ : नूह, व्यभिचारी और हत्यारा : दाऊद, वेश्या: राहाब, हत्यारा : मूसा . . . . . सब याहुशुआ में माफी किए और स्वीकारे गए।
आप निश्चय विश्वास कर सकते हैं कि याहुवाह आपको स्वीकार करेगा क्योंकि याहुशुआ की मृत्यु इसलिए नहीं हुई, की आप नष्ट हो जाओ।
प्रिय में स्वीकार किया गया
हमें तुच्छ महसूस करना अच्छा नहीं लगता। हमे अपने पाप को महसूस करना पसंद नहीं आता। लेकिन खुश खबर यह है कि, याहुशुआ की मृत्यु पापियों को बचाने के लिए हुई है। इसका अर्थ यह है कि, अगर आप पापी हैं, वह आपके लिए मर गए!
पर फरीसी और शास्त्री शिकायत किए, “यह तो पापियों से मिलता है और उनके साथ खाता भी है।” (लूका १५:२; HINDI-BSI)
क्या आप पापी हो? तो जान लीजिए वो आपके लिए मर गया। अपने पाप को नजर-अन्दाज मत करिए। स्वीकार करें।
आपको उद्धारकर्ता से दूर रहने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप पापी हैं। दूर मत रहिए क्योंकि आप बाइबिल विद्वान नहीं है। दूर मत रहिए क्योंकि आप शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं कि याहुवाह आपको माफ करने के बाद भी आपने फिर से सारी पुरानी गलतीयाँ किया है। आप जैसे हैं वैसे ही पिता के पास आइए।
चाहे आपके द्वारा किए गए पापों की मात्रा की कोई सीमा न हो, फिर भी याहुवाह आपको स्वीकार करेगा और आपको क्षमा करेगा। याह का प्रेम और अनुग्रह असीमित है!
क्या आप अपराध बोध के बोझ तले संघर्ष कर रहे हैं? क्या शैतान आप पर आपकी अयोग्यता के प्रति जागरूकता का दबाव डाल रहा है? उसके लिए याह की स्तुति करो क्योंकि तुम वही हो जिसके लिए उसने अपना एकलौता पुत्र दिया।
आप कभी भी ऐसा कुछ कर ही नहीं सकते जिसके कारण याहुवाह आपसे अपना मँह मोड लें। केवल एक चीज जो कभी भी रास्ते में आ सकती है वो आपकी निज़ी पसंद है। तो चुनाव करें! विश्वास के हाथ को आगे बढ़ाए और वादे को पकड़े! उद्धार आपका है। आपको बस इतना करना है कि इसे विश्वास से स्वीकार करें।
आत्मा और दुल्हिन दोनों कहती हैं, “आ!” और सुननेवाला भी कहे, “आ!” जो प्यासा हो वह आए, और जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले। (प्रकाशितवाक्य २२:१७; HINDI-BSI)
मिस प्रिया चिंतित थी। दूसरी कक्षा के छात्रों के साथ रेल गाडी की संग्रहालय का दोपहर की यात्रा अच्छी रही। बच्चों में रुचि थी और (अधिकांश भाग के लिए) अच्छा व्यवहार किया। संग्रहालय में कुछ भी क्षतिग्रस्त होने से पहले वह सूरज और अमित के संक्षिप्त कुश्ती की मैच को रोकने में सक्षम थी। वह नन्ही स्रेश्ठा के लिए समय से पहले ही बाथरूम ढूंढ़ने में सक्षम थी, जो वास्तव में, अभी भी पहली कक्षा में होना चाहिए था। और सभी बच्चों को उनके माता-पिता समय पर संग्रहालय में से घर ले गए थे, केवल एक को छोड़कर।
अरूणा को घर ले जाने कोई नहीं आया। दोफहर के तीन बज चुके थे। फिर चार और अब पाँच। मिस प्रिया के पास अरूणा के घर का फोन नंबर नहीं था और इस समय स्कूल में कोई नहीं था जिससे वह पूछताछ कर सके। वह नहीं जानती थीं कि अरुणा कहाँ रहती है और इससे भी बड़ी बात यह है कि छोटी अरुणा भी नहीं जानती थी की वह कहाँ रहती है।
परिवहन संग्रहालय शहर के सबसे अच्छे हिस्से में नहीं था और मिस प्रिया घबरा रही थी। अगर वह अरुणा को अपने साथ घर ले जाती, तो उसके माता-पिता को यह बताने का कोई तरीका नहीं होता कि छोटी लड़की कहाँ है। उनसे संपर्क करने का कोई रास्ता नहीं होने के कारण, वह बैठने और प्रतीक्षा करने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी। और प्रतीक्षा करना। और प्रतीक्षा करना।
शिक्षक और छोटी लड़की ने समय बीतने के लिए विभिन्न अनुमान लगाने वाले खेल खेले। बार-बार शिक्षक, बच्ची को चिंता न करने के लिए कहती थी, और छोटी अरुणा हमेशा कहती थी, “कोई बात नहीं, मेरी माँ आ जाएगी।”
सवा पांच बजे संग्रहालय चलाने वाला शख्स बाहर आया। वह भी चिंतित था। वह पार्किंग स्थल के घने अंधेरे में एक महिला और बच्ची को अकेला छोड़कर जाना नहीं चाहता था।
अंत में, शाम के साढ़े पाँच बजे, दूसरे बच्चों को उनके माता-पिता घर ले जाने के दो घंटे से अधिक समय बाद, अरुणा की माँ आ गईं। माफी माँगते और उनकी देरी के कारण को स्पष्ट करते हुए उसने अपनी छोटी लड़की को गले लगाया, जो शांति से शिक्षक की कार से बाहर निकली और उसके माँ की कार में घुस गई, “धन्यवाद, मिस! कल मिलते हैं!” कहकर, खुशी से मुस्कुराई।
घर लौटते समय, वह इस घटना के बारे में सोचने लगी। मिस प्रिया अरुणा के शांत होने पर अचंभित थी। वह घबराई नहीं थी। वह डरी नहीं थी। उसे चिंता नहीं थी। वह जानती थी कि माँ आएगी। नन्ही बच्ची के मन में यह विचार स्पष्ट रूप से कभी आया ही नहीं कि माँ शायद न आये। इसके बजाय, वह निश्चिंत थी, खुशी-खुशी शिक्षक के साथ खेल खेल रही थी। उसे पूरा विश्वास था कि माँ आएगी क्योंकि माँ ने कहा था कि वह आएगी। अपनी माँ में इस पूर्ण विश्वास ने अरुणा को धैर्य के साथ लंबे समय तक प्रतीक्षा करने की अनुमति दी।
विश्वासियों के लिए संयम का अभ्यास करने और ऐसा करने वालों के लिए प्रशंसा से नया नियम भरा हुआ है। यह स्पष्ट रूप से एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक विशेषता है जो एक मसीही के पास होना चाहिए। समस्या यह है कि अधिकांश लोग ठीक से समझ नहीं पाते हैं कि “धैर्य” या “सयंम” क्या है, जैसा कि पवित्रशास्त्र में कहा गया है। बचपन में सयंम रखने के लिए डाँटे जाना याद आने पर, वे मानते हैं कि अनपेक्षित देरी पर ऊब महसूस होने पर, शांत होने से ज्यादा कुछ नहीं है। ऐसी परिभाषा आधुनिक शब्दकोशों द्वारा समर्थित है जो सयंम को इस प्रकार परिभाषित करते हैं: “बिना शिकायत के प्रतीक्षा करने या सहने की इच्छा या क्षमता।”१
जब बाइबल विश्वासियों को “धैर्य” बरतने का निर्देश देती है, तो उसके पूरे महत्व को समझने के लिए यह सीखना आवश्यक है कि शब्द को कैसे परिभाषित किया गया था जब बाइबल के अनुवादकों ने इसे मूल यूनानी शब्द का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना था।
धैर्य, एक शांत, अविचलित स्वभाव के साथ कष्टों, पीड़ा, परिश्रम, विपत्ति, उकसावे या अन्य बुराई की पीड़ा; बिना कुड़कुड़ाए या चिड़चिड़ेपन सहना। धैर्य संवैधानिक दृढ़ता से आ सकता है. . . या दिव्य इच्छा को मसीही समर्पण से आ सकता है. . . . न्याय के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करने की क्रिया या गुण या असंतोष के बिना अच्छाई की अपेक्षा करना।२

एक शांत आत्मा के साथ ऊबाऊ समय को सहन करने से कहीं अधिक, सच्चा मसीही का संयम विश्वास पर स्थापित होता है और आत्मिक विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सभी के जीवन में आने वाली परीक्षाओं को याहुवाह द्वारा अनुमति दी जाती है ताकि आत्मिक शक्ति और सहनशक्ति का विकास किया जा सके। रोमियों को लिखी गई पत्री की पाँचवीं अध्याय में, पौलुस उस प्रक्रिया को बताता है जिसके द्वारा धैर्य या संयम सीखा जा सकता है और इसके परिणामस्वरूप होने वाले आध्यात्मिक पुरस्कार:
हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यह जानकर कि क्लेश से धीरज, और धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है; और आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा याहुवाह का प्रेम हमारे मन में डाला गया है। (रोमियों ५:३-५; HINOVBSI)३
याहुवाह का अनुसरण करने वाले सभी लोगों के मार्ग को घेरने वाले संघर्ष और परीक्षण अनंत प्रेम द्वारा अनुमत हैं। दिव्य शक्ति में विश्वास और भरोसा से ही इन परीक्षणों पर विजय प्राप्त किया जा सकता है। यह प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत ज्ञान, व्यक्तिगत अनुभव देता है कि याहुवाह भरोसेमंद है।
“धैर्य” उन सभी के लिए उपलब्ध है जो इसकी तलाश करेंगे। यह दैनिक जीवन में याहुवाह पर भरोसा करने को चुनने से प्राप्त होता है। यह एक सचेत चुनना है। यह एक ऐसा निर्णय है जो भावनाओं पर आधारित नहीं है। वास्तव में, विश्वास का प्रयोग करते समय भावनाओं (भय, संदेह) को अक्सर अनदेखा किया जाना चाहिए। “किसी दूसरे के द्वारा घोषित किया गया सत्य जो उसके अधिकार और सच्चाई को छोड़कर, किसी भी अन्य सबूत के बिना मन से स्वीकार कर लेना ही, विश्वास होता है। यह मानसिक निर्णय है कि जो दूसरा व्यक्ति कहता या पुष्टि करता है, वास्तव में, सच है।” यही विश्वास है। ४
याहुवाह अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं, परन्तु यदि वे विश्वास करना नहीं चुनते हैं, तो वह उनके लिए जो कर सकता है उसमें सीमित हैं। जैसे याहुशुआ ने समझाया, ‘यीशु ने उससे कहा, “यदि तू कर सकता है? यह क्या बात है! विश्वास करनेवाले के लिए सब कुछ हो सकता है।” ‘ (मरकुस ९:२३; HINOVBSI)
जब, विश्वास की प्रार्थना के उत्तर में, याहुवाह एक सामर्थी छुटकारा कार्य करता है, तो हृदय में कृतज्ञता जागृत होती है। बदले में, प्राप्त आशीर्वादों के लिए आभार होना प्रेम को प्रेरित करता है। इस अनुभव के माध्यम से प्राप्त होने वाले प्यार और भी अधिक विश्वास को प्रेरित करता है जो अपने आप में एक चक्र जैसा है। अनुभवों के द्वारा प्रेम का उत्पन्न होना, जो याहुवाह में अधिक विश्वास प्रेरित करता है!
पवित्रशास्त्र में दिए गए वादों पर भरोसा करना चुनें। ये आप के लिए याहुवाह के शब्द हैं। एक सर्व-सामर्थी, सर्व-प्रेमी सृष्टिकर्ता के रूप में उनके बारे में अपने व्यक्तिगत ज्ञान पर अपने भरोसे को आधारित करें। यही कारण है कि याहुवाह ने अपने वचन में अनगिनत वादे दिए हैं।
क्योंकि उसके ईश्वरीय सामर्थ ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिस ने हमें अपनी ही महिमा और सद्गुण के अनुसार बुलाया है। जिन के द्वारा उस ने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएं दी हैं: ताकि इन के द्वारा तुम उस सड़ाहट से छूट कर जो संसार में बुरी अभिलाषाओं से होती है, ईश्वरीय स्वभाव के समभागी हो जाओ। और इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्न करके, अपने विश्वास पर सद्गुण, और सद्गुण पर समझ। और समझ पर संयम, और संयम पर धीरज, और धीरज पर भक्ति। और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति, और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ। क्योंकि यदि ये बातें तुम में वर्तमान रहें, और बढ़ती जाएं, तो तुम्हें हमारे ऐलोआह याहुशुआ के पहचानने में निकम्मे और निष्फल न होने देंगी। (२ पतरस १:३-८; HHBD)
जो लोग भरोसे के साथ दिव्य इच्छा को समर्पित होते हैं उन्हें धैर्य प्राप्त होगा। वे सब बातों में याहुवाह पर भरोसा रखते हैं, यह जानते हुए कि “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहता, परन्तु जो जो वचन यहोवा के मुँह से निकलते हैं उन ही से वह जीवित रहता है।” (व्यवस्थाविवरण ८:३ HINOVBSI) जब दूसरों के द्वारा ठेस पहुँचती है या उनके साथ अन्याय होता है, तो धैर्य रखनेवाले बदला नहीं लेते। वे याहुवाह पर हर गलत को सही करने के लिए भरोसा करते हैं, इस वादे का दावा करते हुए: “बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।” (रोमियों १२:१९; HINOVBSI)
पौलुस ने इस अनुभव की तुलना एक लंबी दौड़ से की, प्रोत्साहन करते हुए उन्होंने कहा: “इस कारण जब कि गवाहों का ऐसा बड़ा बादल हम को घेरे हुए है, तो आओ, हर एक रोकने वाली वस्तु, और उलझाने वाले पाप को दूर कर के, वह दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें। और विश्वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले याहुशुआ की ओर ताकते रहें;”(इब्रानियों १२: १-२; HHBD) मसीही जीवन एक लंबी दूरी की दौड़ की तरह है। इसे तेज दौड़ में नहीं जीता जा सकता। बल्कि इसके लिए धैर्य, दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रतिफल के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करने की इच्छा की आवश्यकता होती है। याहुवाह के वचन के वादे विश्वासियों को उनकी व्यक्तिगत जीवन की दौड़ में मज़बूत करने के लिए दी गई हैं।
“जितनी बातें पहिले से लिखी गईं, वे हमारी ही शिक्षा के लिये लिखी गईं हैं कि हम धीरज और पवित्र शास्त्र की शान्ति के द्वारा आशा रखें।” (रोमियो १५:४; HHBD)
प्रकाशितवाक्य से पता चलता है कि अंतिम पीढ़ी के पास धीरज की आध्यात्मिक कृपा होगी।
जिस को कैद में पड़ना है, वह कैद में पड़ेगा, जो तलवार से मारेगा, अवश्य है कि वह तलवार से मारा जाएगा, पवित्र लोगों का धीरज और विश्वास इसी में है॥ (प्रकाशित वाक्य १३:१०; HHBD)
फिर इन के बाद एक और स्वर्गदूत बड़े शब्द से यह कहता हुआ आया, कि जो कोई उस पशु और उस की मूरत की पूजा करे, और अपने माथे या अपने हाथ पर उस की छाप ले। तो वह परमेश्वर का प्रकोप की निरी मदिरा जो उसके क्रोध के कटोरे में डाली गई है, पीएगा और पवित्र स्वर्गदूतों के साम्हने, और मेम्ने के साम्हने आग और गन्धक की पीड़ा में पड़ेगा। और उन की पीड़ा का धुआं युगानुयुग उठता रहेगा, . . . उन को रात दिन चैन न मिलेगा। पवित्र लोगों का धीरज इसी में है, जो याहुवाह की आज्ञाओं को मानते, और याहुशुआ पर विश्वास रखते हैं॥ (प्रकाशित वाक्य १४:९-१२; HHBD)
यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि प्रत्येक उदाहरण याहुशुआ और शैतान के बीच की अंतिम संघर्ष के संदर्भ में दिया गया है। वे सभी जो पृथ्वी के अंतिम संघर्ष में शैतान पर विजय प्राप्त करेंगे, वे केवल याहुवाह की शक्ति में ऐसा कर पाएँगे। यह शक्ति उनके मुक्तिदाता में विश्वास के माध्यम से है। विश्वास का प्रयोग करके, उनके चरित्र के अपने ज्ञान के आधार पर, वे धैर्य या सयंम रखने का प्रयोग करेंगे।
गतसमने के बगीचे में याहुशुआ की तरह, उनके विश्वास की परीक्षा पूरी तरह से होगी।
क्रूस पर याहुशुआ की तरह, ऐसे समय होंगे जब, भावनात्मक रूप से, वे ऐसा महसूस करेंगे जैसे कि उनके स्वर्गीय पिता ने आखिरकार उन्हें छोड़ दिया है।
याहुशुआ की तरह, वे पूरी तरह से याहुवाह पर अपना भरोसा रखकर जयवंत होंगे। वे अपनी इच्छाओं को दिव्य इच्छा के आगे समर्पित कर देंगे और प्रतीक्षा करते हैं कि वह उस तरीके से उद्धार करे जिस तरह से वह सबसे अच्छी तरह जानता है। वे न्याय के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के लिए संतुष्ट हैं, यह जानते हुए कि उनकी कल्पना से परे उद्धार और पुरस्कार उन लोगों के मिलेंगे जो उद्धारकर्ता पर भरोसा करते हैं।
याहुशुआ के शब्द उनके व्यक्तिगत अनुभव का हिस्सा है: “और तुम्हारे माता पिता और भाई और कुटुम्ब, और मित्र भी तुम्हें पकड़वाएंगे; यहां तक कि तुम में से कितनों को मरवा डालेंगे। और मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेंगे। परन्तु तुम्हारे सिर का एक बाल भी बांका न होगा। अपने धीरज से तुम अपने प्राणों को बचाए रखोगे॥” (लूका २१:१६-१९, HHBD)
संत याहुवाह पर भरोसा करते हैं। वे उनके वादों पर भरोसा करते हैं। यह विश्वास व्यक्तिगत अनुभव पर बनाया गया है। वह जानते हैं की: “ऐलोआह यह सब करेगा, क्योंकि उसने आपको बुलाया है और वह विश्वसनीय है।” (१ थिस्सलुनीकियों ५:२४; HINCLBSI) वे कठिनाई, उत्पीड़न और तिरस्कार को सहन सकते हैं क्योंकि उन्हें पूरा भरोसा है कि याहुवाह उन्हें छुटकारा दिलाएगा और वादा किया हुआ प्रतिफल निश्चित है।
सो अपना हियाव न छोड़ो क्योंकि उसका प्रतिफल बड़ा है। क्योंकि तुम्हें धीरज धरना अवश्य है, ताकि परमेश्वर की इच्छा को पूरी करके तुम प्रतिज्ञा का फल पाओ। क्योंकि अब बहुत ही थोड़ा समय रह गया है जब कि आने वाला आएगा, और देर न करेगा। और मेरा धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा, और यदि वह पीछे हट जाए तो मेरा मन उस से प्रसन्न न होगा। पर हम हटने वाले नहीं, कि नाश हो जाएं पर विश्वास करने वाले हैं, कि प्राणों को बचाएं॥ (इब्रानियों १०:३५-३९; HHBD)
जितने याहुवाह में विश्वास के द्वारा धीरज धरते हैं, वे याहुवाह के वारिस और याहुशुआ के संगी वारिस होंगे। लेकिन जो लोग धैर्य का विकास नहीं करते वे खो जाएंगे।
जो जय पाए, वही इन वस्तुओं का वारिस होगा; और मैं उसका परमेश्वर होऊंगा, और वह मेरा पुत्र होगा। पर डरपोकों, और अविश्वासियों, और घिनौनों, और हत्यारों, और व्यभिचारियों, और टोन्हों, और मूर्तिपूजकों, और सब झूठों का भाग उस झील में मिलेगा, जो आग और गन्धक से जलती रहती है: यह दूसरी मृत्यु है॥ (प्रकाशित वाक्य २१:७-८; HHBD)
यह उन लोगों की एक लंबी, बहुत व्यापक सूची है जो खो गए हैं! यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि टोन्हें, मूर्तिपूजक, झूठे, व्यभिचारी और हत्यारे खो गए। लेकिन डरपोक? क्यों कोई इंसान सिर्फ डरने के कारण खो जाए?
उत्तर सरल है: “डरपोक” खोए हुए हैं क्योंकि वे “अविश्वासी” हैं। विश्वास केवल याहुवाह को उसके वचन पर लेना है क्योंकि वह कौन है और क्या है (सर्व-प्रेमी और सर्व-शक्तिमान), और किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। इसलिए, उनके वादों में विश्वास की कमी, संक्षेप में, उन्हें झूठा कहना है।
अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।
और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आने वाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजने वालों को प्रतिफल देता है। (इब्रानियों ११:१, ६; HHBD)
यह बहुत ही महत्वपूर्ण लेकिन व्यक्तिगत अनुभव एक सुसमाचार गीत के शब्दों में अच्छी तरह से अभिव्यक्त किया गया है :
विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय;
अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।
याहुवाह का वचन कहा है और मैं भरोसा करता हूँ
मेरे जिन्दगी में अद्भुत हुआ।
याहुवाह ने कहा! और मैं भरोसा करता हूँ!
और मेरे लिए यही काफ़ी है. . . .
चाहे कुछ लोग उनके वचन के सच्चाई पर शक करें
मैंने तो भरोसा करने को चुना है, अब, आप क्या करेंगे?
याहुवाह ने कहा! और मैं भरोसा करता हूँ!
और मेरे लिए यही काफ़ी है. . . .
यदि आपको याहुवाह पर उनके वादों को पूरा करने के लिए विश्वास नहीं है, तो आपके पास अपनी ओर से कार्य करने के लिए, उनकी प्रतीक्षा करने का धैर्य नहीं होगा। आप भरोसा नहीं करेंगे कि वह याहुशुआ को उन सभी को छुड़ाने के लिए भेजेगें जो भरोसे के साथ उनके लौटने की बाट जोहते हैं। इसके बजाय, आप डरेंगे। मत्ती का सुसमाचार उन सभी के लिए बोले गए दुखद शब्दों को दर्ज करता है, जो विश्वास की कमी के कारण, बाइबिल के धैर्य को विकसित करने में विफल रहे हैं:
जो मुझ से, हे प्रभु, हे प्रभु कहता है, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ। (मत्ती ७:२१-२३; HHBD)
लेकिन यह किसी का भाग्य होना जरूरी नहीं है! “प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के विषय में देर नहीं करता, जैसी देर कितने लोग समझते हैं; पर तुम्हारे विषय में धीरज धरता है, और नहीं चाहता, कि कोई नाश हो; वरन यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले।” (२ पतरस ३:९; HHBD) यदि आपको बुद्धि की घटी हो, विश्वास की घटी हो, या सयंम की घटी हो – याहुवाह से पुछें! वह आपको देगा। वह अपने बच्चों से कोई भी अच्छी चीज़ को उनसे दूर नहीं रखेगा।

लेकिन किसी का भाग्य ऐसा होने की जरूरत नहीं है! यदि आप में ज्ञान की कमी है, यदि आप में विश्वास की कमी है, यदि आप में धैर्य की कमी है – इसके लिए याहुवाह से माँग करें! वह अपने बच्चों से कोई अच्छी वस्तु नहीं रख छोड़ेगा
क्योंकि विश्वास भावनाओं पर आधारित नहीं है, अपनी भावनाओं की परवाह किए बिना उस पर भरोसा करने का सरल चुनाव आज ही करें! याहुवाह पर, भरोसे के साथ, धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने की आदत डालिए।
हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो, यह जान कर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे॥ पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उस को दी जाएगी। पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करने वाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है। (याकूब १:२-६; HHBD)
याहुवाह में विश्राम करना प्रतिदिन की आदत बना लें। उनके वचन का दावा करें, उनके वचन पर भरोसा रखें। आप भी, संतों के समान धैर्य रख सकते हैं और हमारे उद्धारकर्ता याहुशुआ के साथ “सब बातों के वारिस” हो सकते हैं।
१ हिन्दी शब्दकोश
२ हिन्दी शब्दकोश
३ पिता और पुत्र के सही नाम बहाल किया गया
४ हिन्दी शब्दकोश
एक प्रिय जन की मृत्यु लाती है हृदय पीड़ा, दुःख, एक दूसरे मौके की लालसा, और अक्सर . . . प्रश्न.
किसी के भी जीवन में इस अति संवेदनशील दुःख के समय में, मस्तिष्क उत्तर चाहता है.
“क्या यही सब कुछ है?”
“क्या वह हमेशा ले लिए चली गई?”
“उसका अब क्या हो रहा है?”
“वह कहाँ है?”
“निश्चय मेरा बेबी अब स्वर्ग में है… वह है ना?”
“काश मैं निश्चित होता!”
“मैं यह विचार भी सहन नहीं कर सकती कि वो नरक में दुःख झेल रहा है!”
“कैसा ईश्वर है जो लोगों को जलाता है?”
“क्या वो वहाँ ऊपर है मुझे देख रही है? हर समय ?”
“यहाँ तक की जब मैं . . . मैं निश्चित नहीं हूँ कि मैं हर समय देखे जाने के विचार को पसंद करूं!”
एक प्रेमी स्वर्गीय पिता जानता है उसके सांसारिक बच्चों के पास ऐसे प्रश्न होंगे. धर्मशास्त्र में, उसने प्रत्येक ह्रदय पीड़ित आत्मा के लिए उत्तर दिया हुआ है. बहुत से लोगों को यह सिखाया जाता है कि उनकी अनश्वर आत्मा जीवित रहती है. जबकि, बाइबल दो सिद्धान्तों को स्थापित करती है जो शैतान के इस छल को प्रगट करते हैं.
१ तीमुथियुस ६:१६ बताता है की केवल यहुवाह “अमरता केवल उसी [यहुवाह] की है, और वह अगम्य ज्योति में रहता है, और न उसे किसी मनुष्य ने देखा और न कभी देख सकता है.”
बाइबल सिखाती है, “इसलिए जो प्राणी पाप करे वही मर जाएगा.” (यहेजकेल १८:४)
धर्मशास्त्र स्पष्ट रूप से बताते जाता है:
“निष्पाप तो कोई मनुष्य नहीं है.” (१ राजा ८:४६)
“इसलिए कि सबने पाप किया है और [यहुवाह] की महिमा से रहित हैं.” (रोमियो ३:२३)
मृत्यु प्रत्येक मनुष्य का भाग है, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य ने पाप किया है. सृष्टिकर्ता, जिसके प्रेमी ह्रदय ने कभी यह नहीं चाहा की उसके बच्चे पाप में दुःख झेलें, उसी ने मृत्यु के समय क्या होता है की सभी शंकाओं को दूर कर दिया.
एक “आत्मा” कोई देह मुक्त जीव नहीं है जो चारों तरफ तैर रहा है. आदि में, यहुवाह ने “आदम को भूमि की मिट्टी से रचा, और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूंक दिया और आदम जीवित प्राणी बन गया.” (उत्त्पति २:७) एक “आत्मा” एक साधारण देह मुक्त जीव नहीं हो सकता क्योंकि इसके पास आत्मा को बनाने के लिए दोनों एक शरीर और जीवन की श्वास होती है.
“क्योंकि अब तक मेरी साँस बराबर आती है, और यहुवाह का आत्मा मेरे नथुनों में बना है.” (अय्यूब २७:३)
मृत्यु के बाद चेतना नहीं होती.
“तुम प्रधानों पर भरोसा न रखना, न किसी आदमी पर, क्योंकि उसमे उद्धार करने की भी शक्ति नहीं. उसका भी प्राण निकलेगा, वह भी मिट्टी में मिल जाएगा; उसी दिन [उसकी मृत्यु के दिन] उसकी सब कल्पनाएँ नष्ट हो जाएँगी.” (भजन १४६:३,४)
वे सभी जो धर्मशास्त्र के स्पष्ट व्याख्यानों को अनदेखी करते हैं की मृत्यु के बाद कोई चेतना नहीं है वे अपने आप को संकट में डालते हैं. इस विश्वास के साथ चिपके रहना की मृत्यु के बाद जीवन है, एक व्यक्ति को प्रेतों के द्वारा छले जाने के लिए खुला निमंत्रण है. आत्माओं से बातचीत करना दुष्ट दूतों द्वारा एक मृतक प्रिय जन का रूप लेने से अधिक और कुछ नहीं है. इस व्यवहार की बाइबल में तीव्र निंदा की गई है.
धर्मशास्त्र में स्वर्गीय पिता के चरित्र का बड़े ही सारगर्भित ढंग से निष्कर्ष निकाला गया है. १ यहुन्ना ४:८ बताता है कि यहुवाह सर्वथा और सम्पूर्ण रूप से प्रेम है. पूर्ण प्रेम किसी को एकमात्र जीवन काल में किये गये पापों के लिए अनन्त काल तक जलाए जाने की दण्ड आज्ञा नहीं देता.
“पाप की मजदूरी तो मृत्यु है.” (रोमियों ६:२३)
पाप के लिए दण्ड मृत्यु है नाकि अनन्त काल के जीवन की पीड़ा.
“क्योंकि जीवते तो इतना जानते हैं कि वे मरेंगे, परन्तु मरे हुए कुछ भी नहीं जानते, और न उनको कुछ और बदला मिल सकता है, क्योंकि उनका स्मरण मिट गया है.” (सभोपदेशक ९:५)
यहाँ तक की मृत्यु में भी प्रेमी स्वर्गीय पिता का प्यार लगातार चमकते रहता है. धर्मशास्त्र मृत्यु को नींद से कुछ अधिक नहीं प्रगट करता है. जब मुक्तिदाता याइर के घर आया, जिसकी लड़की अभी मरी थी, उसने प्रोत्साहित किया, “लड़की मरी नहीं पर सोती है.” किराये के रोने वाले उसका मतलब नहीं समझे और “उसकी हँसी” करने लगे. (देखिये मत्ती ९:२४)
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एक ईमानदार बाइबल के छात्र के समान, धर्मशास्त्र के अध्ययन के समय हमे हमेशा साक्ष्य के महत्व को स्वीकार करना चाहिए. व्याख्यान और प्रथाओं ने बहुतों को मृतक की दशा की गलत समझ की ओर अग्रसर किया है.
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यहाँ तक कि चेले भी यह जानकर भौचच्के थे की मृत्यु सृष्टिकर्ता के लिए केवल “नींद” है. जब लाजर मर गया, यहुशुआ ने अपने चेलों से कहा, “हमारा मित्र लाजरस सो गया है, परन्तु मैं जाता हूँ कि उसे जगा सकूँ.” चेले समझ नहीं सके कि लाजरस मर गया है. उन्होंने कहा, “यदि सो गया है तो वह स्वस्थ हो जाएगा.” जबकि यहुशुआ उसकी मृत्यु के बारे में कह रहा था, परन्तु वे सोच रहे थे कि वह नींद में किये जा रहे विश्राम के बारे में कह रहा है. तब यहुशुआ ने उनसे साफ-साफ कह दिया, “लाजरस मर गया है.” (देखिये यहुन्ना ११:११-१४) जब आदम और हव्वा ने पाप किया, उनके प्रेमी पिता ने दुःख
पूर्वक बताया कि उनके जीवन का नया भाग क्या होने वाला है:
“और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है; तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा. (उत्पत्ति ३:१९)
जब एक व्यक्ति मरता है, जीवन की श्वास सृष्टिकर्ता के पास लौट जाति है और शरीर मिट्टी में वापस चला जाता है जहाँ से वह बनाया गया था. बुद्धिमान राजा सुलैमान ने अपने जीवन के अन्त के समय सभी को यह शिक्षा दी:
“अपनी जवानी के दिनों में अपने सृजनहार को स्मरण रख,
इससे पहले की विपत्ति के दिन [वृद्धावस्था] आये,
और वे वर्ष नजदीक आएँ, जिनमें तू कहे, “कि मन इनमे नहीं लगता,
अपने सृष्टिकर्ता का स्मरण कर इससे पहले कि चाँदी का तार दो टुकड़े हो जाए. . .
तब मिट्टी ज्यों की त्यों मिट्टी में मिल जाएगी.
और आत्मा सृष्टिकर्ता के पास जिसने उसे दिया लौट जाएगी.” (सभोपदेशक १२:१, ६-७)
विचारों का अन्त हो जाता है और आत्मा नींद में चली जाती है जब शरीर मर जाता है श्वास सृष्टिकर्ता के पास लौट जाती है.
“क्योंकि मृत्यु के बाद तेरा स्मरण नहीं होता; अधोलोक में कौन तेरा धन्यवाद करगा?” (भजन ६:५)
“मृतक चुपचाप पड़े रहते हैं वे तो [यहुवाह] की स्तुति नहीं कर सकते.” (भजन ११५:१७)
उन सभी के लिए जो मुक्तिदाता से प्रेम करते हैं, मृत्यु एक नींद है—उनके परिश्रम से एक विश्राम जबकि वे जीवन देने वाले की बाट जोहते रहते हैं कि वह वापस आये और उन्हें वापस जीवन में उठाए. जब यहुशुआ दूसरी बार आएगा, वह उन सभी को जो उस विश्वास करते हुए मरे हैं उन्हें वापस जिलाएगा. तब वे जो पुनर्जीवित हो चुके हैं और साथ ही साथ धर्मी जो अभी जीवित हैं उसके साथ स्वर्ग ले जाए जाएँगे.
जैसा कि प्रेरित पौलुस ने थिस्लुनिकियो को प्रोत्साहित किया:
“हे भाइयों हम नहीं चाहते कि तुम उनके विषय में जो सोते हैं, अज्ञानी रहो; ऐसा न हो कि तुम दूसरों के समान शोक करो जिन्हें आशा नहीं. क्योंकि यदि हम विश्वास करते हैं कि यहुशुआ मरा और जी भी उठा, तो वैसे ही यहुवाह उन्हें भी जो यहुशुआ में सो गये हैं उसी के साथ ले जाएगा. क्योंकि हम यहुवाह के वचन के अनुसार तुमसे यह कहते हैं कि हम जो जीवित हैं और यहुशुआ के आने तक बचे रहेंगे, सोए हुओं से कभी आगे न बढ़ेंगे. क्योंकि यहुशुआ आप ही स्वर्ग से उतरेगा; उस समय ललकार, और प्रधान दूत का शब्द सुनाई देगा, और यहुवाह की तुरही फूँकी जाएगी; और जो मसीह में मरे हैं, वे पहले जी उठेंगे: तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे उनके साथ बादलों पर उठा लिए जाएँगे कि हवा में मुक्तिदाता से मिलें; और इस रीति से हम सदा यहुशुआ के साथ रहेंगे. इस प्रकार इन बातों से एक दूसरे को शान्ति दिया करो. (देखिये १ थिस्लुनिकियो ४:१३-१८)”
अनश्वरता दान है जो यहुशुआ अपने दूसरे आगमन पर उन सभी को जो उससे प्रेम रखते और भरोसा रखते को देता है.
“क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु [यहुवाह] का वरदान हमारे [यहुशुआ हमारे उद्धारकर्ता] में अनन्त जीवन है.” (रोमियो ६:२३)
उन सभी को जो दूसरे आगमन तक जीवित रहेंगे यह बताते हुए पौलुस बताता है:
“देखो, मैं तुमसे भेद की बात कहता हूँ: हम सब नहीं सोयेंगे, परन्तु सब बदल जाएँगे, और यह क्षण भर में, पलक मारते ही अन्तिम तुरही फूँकते ही होगा. क्योंकि तुरही फूँकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएँगे और हम बदल जाएँगे. क्योंकि अवश्य है कि यह नाशवान देह अमरता को पहन ले.” (१ कुरन्थियो १५:३१-५३)”
वे सभी जो सृष्टिकर्ता से प्रेम और उस पर भरोसा रखते उन्हें मृत्यु से डरने का आवश्यकता नहीं. यहुवाह ने वाचा बाँधी है:
“मैं उसको अधोलोक के वश से छुड़ा लूँगा और मृत्यु से छुटकारा दूँगा. हे मृत्यु तेरी मारने की शक्ति कहाँ रही? हे अधोलोक तेरी नष्ट करने की शक्ति कहाँ रही?” (होशे १३:१४)
उस आनन्द के दिन में, प्रत्येक नई अनश्वरता पाये लोगों की जुबान पर यह गीत होगा:
“हे मृत्यु तेरा डंक कहाँ?
हे मृत्यु तेरी जय कहाँ रही?”
(१ कुरन्थियो १५:५५)
किसी भी वस्तु के डर से बहुत दूर, मृत्यु एक विश्राम है जो प्रेमी पिता अपने थके हुए बच्चे को देता है, जो दूसरे आगमन की बाट जोह रहे हैं जहाँ “हम कभी अलग नहीं होंगे.”
ब्रह्माण्ड थमी हुई साँस के साथ इंतजार कर रही थी। यह एक ऐसा आपत्ति थी जिसका किसी ने कभी कल्पना नहीं की थी। नुकसान के लिए क्षमता असीम थी। इससे पहले कभी भी इस परिमाण का संकट नहीं था। याहुवाह क्या करेंगे? याहुवाह क्या कर सकते थे?
जब शैतान ने आदम और हव्वा को पाप में ले चला, तो यह कोई अचानक से किया गया कार्य नहीं था। यह दिव्य सरकार के निंव के विरुद्ध की गई एक सोची-समझी साजिश थी। दाँव पर दिव्य व्यवस्था थी, जिस पर सृष्टि के सभी प्राणियों की खुशी आधारित थी। दिव्य व्यवस्था दिव्य चरित्र का प्रतिलेख था। पाप ने याहुवाह के भले चरित्र पर सवाल उठाया जो हमेशा से प्रेम ही है: “हे प्रियों, हम आपस में प्रेम रखें; क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है…क्योंकि परमेश्वर प्रेम है।” (१ यूहन्ना ४:७-८)
शैतान का विश्वास था कि उसने याहुवाह को एक असंभव स्थिति में फंसा लिया था। दिव्य व्यवस्था ने सभी अपराधों के लिए सजा के रूप में मृत्यु की घोषणा की। अगर आदम और हव्वा पाप करने के बाद जीवन के वृक्ष का फल खा लिए होता तो, शैतान, अमर पापियों के होने के अस्तित्व से जीत जाता, और याहुवाह झूठे साबित होते। दूसरी ओर, अगर याहुवाह दोषी जोड़े को मौत के साथ दंडित करते, तो शैतान उनको प्रतिहिंसक और कठोर के रूप में चित्रित करता। लेकिन अगर याहुवाह उस जोडे को बिना सजा के माफ करते, तो शैतान दावा कर सकता था कि याहुवाह झूठे थे – अपनी व्यवस्था बदलने के लिए।
गंभीर संकट के इस समय में, याहुवाह ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया और दिव्य चरित्र की पहले से ही अज्ञात विशेषता के साथ शैतान को आश्चर्यचकित किया। याहुवाह ने आदम और हव्वा की ओर अनुग्रह बढ़ाया। इस बात से शैतान आश्चर्यचकित हुआ। उसे अनुग्रह समझ नहीं आया।
अनुग्रह है… “अयोग्य [अपात्रों] के लिए परमेश्वर की मुफ्त मे दी गई प्रेम और कृपा….” (नूह वेबस्टर, अमेरिकन अंग्रेज़ी भाषा की शब्दकोश, १८२८)
इस से पहले कोई भी मनुष्य पाप नहीं किया था, इसलिए किसी को अनुग्रह की आवश्यकता नहीं हुई। यह एक अज्ञात गुण थी।
जब पाप की भयानक आपातकाल स्थिति का सामना करना पड़ा, तब याहुवाह ने अयोग्य, नाहक पाप में गिरी हुई मनुष्य जाती के लिए क्षमा बढ़ा दिया साथ ही साथ उन्होंने खरी दिव्य व्यवस्था को नहीं बदला। उसने अपने पुत्र के जीवन को दोषी व्यक्ति के स्थान पर मरने का वचन दिया। क्योंकि पाप का वेतन मृत्यु है, किन्तु [याहुवाह]. . . का वरदान है हमारे मसीह . . . [याहुशुआ] में शाश्वत जीवन। (रोमियों ६:२३) पवित्र बाइबिलCL-(BSI)
निकेदिमुस को इस अद्भुत, कानूनी, लेन-देन को समझाते हुए, उद्धारकर्ता ने बताया: “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नष्ट न हो, परन्तु अनंत जीवन पाए। परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दंड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए। (यूहन्ना ३:१६-१७)
उनके पुत्र के जीवन के बलिदान के द्वारा, याहुवाह घोषणा कर सका. . . “कि . . .अपनी धार्मिकता प्रकट करें कि वह स्वयं को तथा उसे धर्मी घोषित करें, जिसका विश्वास याहुशुआ में है।” (देखिए रोमियों ३:२६, सरल हिन्दी बाइबिल) व्यवस्था बदली नहीं जा सकती क्योंकि. . . “ व्यवस्था पवित्र है और आज्ञा पवित्र, धर्मी और भली है।”(रोमियों ७:१२, सरल हिन्दी बाइबिल) खड़ी रहेगी परंतु पापीयों को आज्ञाकारिता और जीवन, या विद्रोह और मृत्यु को चुनने का दूसरा मौका दिया गया था। उन्हें चुनाव करने का एक दूसरा मौका इसलिए दिया गया क्योंकि व्यवस्था की आवश्यकता को याहुशुआ की मृत्यु में पूरा किया गया था।
अनुग्रह के इस दिव्य व्यवहार के दूरगामी महत्त्व को पौलुस ने पूरी तरह से समझ लिया जब उसने लिखा:
उसकी बलिदानी मृत्यु के द्वारा अब हम अपने पापों से छुटकारे का आनन्द ले रहे हैं। उसके सम्पन्न अनुग्रह के कारण हमें हमारे पापों की क्षमा मिलती है। अपने उसी प्रेम के अनुसार जिसे वह मसीह के द्वारा हम पर प्रकट करना चाहता था। उसने हमें अपनी इच्छा के रहस्य को बताया है। जैसा कि मसीह के द्वारा वह हमें दिखाना चाहता था। परमेश्वर की यह योजना थी कि उचित समय आने पर स्वर्ग की और पृथ्वी पर की सभी वस्तुओं को मसीह में एकत्र करे। (इफिसियों १:७-१०;ERV-HI)
निश्चय ही सब इस बात से सहमत होंगे की याहुवाह प्रेममयी थे जब उन्होंने पापियों को क्षमा किया था। लेकिन पौलुस यह बता रहा था कि याहुवाह ज्ञानी और बुद्धिमान थे!
बहुमूल्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए विवेकपूर्ण सलाह और सलाह देने में सावधानी बरतना और उन्हें चुनने में और समझने में बुद्धि का प्रयोग करना चतुराई है। चतुराई इस बात में बुद्धि से अलग है कि, चतुराई बुद्धि की तुलना में अधिक सावधानी आरक्षित करता है,या जो अच्छा है उसे संकल्प करने और लागू करने के तुलना में बुराई से बचने के लिए पूर्वाभास का अधिक अभ्यास किया जाता है। (नूह वेबस्टर शब्दकोश, १८२८)
पौलुस कह सका था कि याहुवाह बुद्धिमान और विवेकपूर्ण थे क्योंकि, वह समझ गया कि उद्धार की योजना हमेशा से दिव्य व्यवस्था को पवित्र और अपरिवर्तनीय रूप में स्थापित किया है, साथ ही साथ खोई हुई जाति को भी बचा रहा है। यह जटिल लेकिन सर्वव्यापी योजना मानव जाति के उद्धारकर्ता को हर आदम के पुत्र और पुत्री को बड़ा भाई और उद्धारकर्ता दोनों ही बनने का बुसृलावा देती है। “ यह इसलिए कि जिनके विषय में परमेश्वर को पहले से ज्ञान था, उन्हें परमेश्वर ने अपने पुत्र मसीह येशु के स्वरूप में हो जाने के लिए पहले से ठहरा दिया था कि मसीह येशु अनेक भाइयों में पहलौठे हो जाएँ।” (रोमियों ८:२९, सरल हिन्दी बाइबिल)
याहुशुआ उद्धारकर्ता हैं, विशेष रूप से इस तथ्य से कि उसकी मृत्यु ही थी जो याहुवाह को न सिर्फ न्यायी ठहराया बल्कि पापियों को भी धर्मी ठहराया। ये सत्य हर उस जगह में प्रचार होते हैं जहाँ कहीं मसीह का प्रचार होता है। जो बात कम समझी जाती है, वो यह है कि हमारे उद्धार के कप्तान हमारे बड़े भाई भी हैं।
हमारे बड़े भाई के रूप में याहुशुआ ने हमें पापरहित जीवन जीने कि एक उदाहरण दी है। यह एक शक्तिशाली सत्य है जो शैतान ने कई झूठों से छुपाने की कोशिश की है। इन सभी झूठों में से सबसे व्यापक फैला हुआ झूठ यह है: ये विश्वास करना कि याहुशुआ ने आदम का पाप में गिरने से पहले के स्वभाव को खुद पर ले लिया है। यह एक समस्या है, क्योंकि आदम के गिरने से पहले का उसकी स्वभाव उसके पाप करने के बाद की स्वभाव से भिन्न था। अगर याहुशुआ ने आदम के गिरने से पहले के उसकी स्वभाव को लिया होता, तो वह वास्तव में बड़ा भाई और हमारे लिए उदाहरण नहीं हो सकता क्योंकि उनको हमारे ऊपर एक फायदा होगा। यह शैतान के मूल आरोपों का समर्थन करता है जोकि याहुवाह को अप्रेमी और अन्यायी दिखाता है।
याहुशुआ हमारे स्वभाव में थे। उन्होंने वो सब अनुभव किया जो आदम के किसी भी बच्चे को भुगतना पड़ता है। इस तथ्य को मुख्य कारण के रूप में पौलुस ने प्रोत्साहित किया की हमारे उद्धारकर्ता के रूप में उन पर विश्वास करें!
इसलिए कि वह, जो आकाशमण्डल में से होकर पहुँच गए, जब वह महायाजक—परमेश्वर-पुत्र, मसीह येशु—हमारी ओर हैं; हम अपने विश्वास में स्थिर बने रहें। वह ऐसे महायाजक नहीं हैं, जो हमारी दुर्बलताओं में सहानुभूति न रख सकें परन्तु वह ऐसे महायाजक हैं, जो हरेक पक्ष में हमारे समान ही परखे गए फिर भी निष्पाप ही रहे; इसलिए हम अनुग्रह के सिंहासन के सामने निड़र होकर जाएँ कि हमें ज़रूरत के अवसर पर कृपा तथा अनुग्रह प्राप्त हो। (इब्रानियों ४:१४-१६)
यदि उद्धारकर्ता का स्वभाव हमारे समान नहीं होता, तो वह हमारे लिए उदाहरण नहीं हो सकते थे। इसके साथ, उद्धार की पूरी योजना नष्ट हो जाती यदि याहुशुआ आदम के गिरने से पहले के स्वभाव को ले लिया होता, क्योंकि कोई भी तब तक मृत्यु का पात्र नहीं होता जब तक वह गिरे हुए स्वभाव में नहीं होता।यह सच कि याहुशुआ “जो हर एक पक्ष में हमारे समान ही परखे गए फिर भी निष्पाप ही रहे;” सब को प्रोत्साहित करता है कि हम भी जयवंत हो सकते जिस प्रकार से हमारे मसीह जयवंत हुए। पाप और शैतान की लड़ाई में याहुशुआ की निरंतर जीत का रहस्य उसके पिता की शक्ति पर उसकी लगातार निर्भरता में पाया गया।: “मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता।” (यूहन्ना ५:३०) । अपना सब कुछ याहुवाह को सौंपने के वजह से, याहुशुआ को एक पापरहित जीवन जीने के लिए शक्ति दी गई और उसी तरह जय प्राप्त की जैसे सब जय प्राप्त करते हैं। उसने ऐसी कोई भी शक्ति का प्रयोग नहीं किया जो हम विश्वास के द्वारा नहीं कर सकते। अगर किसी भी तरह, याहुशुआ को उन लोगों के मुकाबले ज्यादा लाभ मिलता, जिन्हें वो बचाने आए थे, तो शैतान के आरोप की याहुवाह अन्यायी हैं, सच साबित होता।
पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से प्रसतुत करता है कि याहुवाह न्यायी और अनुग्रही हैं:
किन्तु यदि कोई डींग मारना ही चाहता है तो उसे इन चीज़ों की डींग मारने दो:
“उसे इस बात की डींग मारने दो कि वह मुझे समझता और जानता है।
उसे इस बात की डींग हाँकने दो कि वह यह समझता है कि मैं यहोवा हूँ।
उसे इस बात की हवा बांधने दो कि मैं कृपालु और न्यायी हूँ।
उसे इस बात का ढींढोरा पीटने दो कि मैं पृथ्वी पर अच्छे काम करता हूँ।
मुझे इन कामों को करने से प्रेम है।”
यह सन्देश यहोवा का है। (यिर्मयाह ९:२३, २४; ERV-HI)
याहुवाह के पुत्र से जो अपेक्षा की गई है उस से भी ज्यादा मानव जाती से करना न्याय नहीं होगा।.न ही ये पूर्ण दया होगी कि अपराधियों को उस तरह के उच्च मानक तक न पहुँचने के लिए उन्हें दण्डित की जाए जब तक कि सभी को विजय मुफ्त में न दी गई हो। उद्धार की योजना दिव्य सरकार के खिलाफ शैतान के सारे आरोपों को शांत करता है। “निश्चय उसके डरवैयों के उद्धार का समय निकट है. . .करूणा और सच्चाई आपस में मिल गई हैं; धर्म और मेल ने आपस में चुम्बन किया है।” (भजन संहिता ८५:९&१०, HHBD)
आज बहुत मसीही ये विश्वास करते हैं कि वो पाप करेंगे और दूसरे आगमन तक पाप करते रहेंगे। यह शैतान द्वारा रची गई झूठ है। पवित्रशास्त्र के आख़िरी पुस्तक में एक गंभीर चेतावनी है, जो सभी को ध्यान देनी चाहिए: “देखो, मैं शीघ्र ही आ रहा हूँ और अपने साथ तुम्हारे लिए प्रतिफल ला रहा हूँ। जिसने जैसे कर्म किये हैं, मैं उन्हें उसके अनुसार ही दूँगा।” (प्रकाशितवाक्य २२:१२, ERV-HI)
दूसरी आगमन के समय में और कोई दूसरा मौका नहीं मिलेगा। जब याहुशुआ आएँगे तो वो हर इन्सान के काम के अनुसार बदला देने के लिए प्रतिफल अपने साथ लाएँगे। यही समय है अपनी ज़िंदगी सुधारने का। अभी जब अनुग्रह मिल रही है, यही समय है याहुवाह को अपना ज़िंदगी समर्पित करने का। और हर पाप पर विजय प्राप्त करने के लिए उनकी मदद स्वीकार करें। उनकी प्रेममयी निमंत्रण आज भी खुला हुआ: “अथवा यदि वे मेरी छत्र-छाया में शरण लेना चाहें तो वे मेरे साथ शांति स्थापित करें। वे मुझसे मेल-मिलाप करें।” (यशायाह २७:५, HINDICL-BSI)
याहुवाह आप के हर चीज से वाक़िफ़ है आपके सपने, आपकी इच्छाएँ, आपकी समस्याएँ, आपकी कमज़ोरियाँ, आपके गुप्त पाप जो कोई और नहीं जानता – फिर भी वो आपसे प्रेम करते हैं। “जिन्हें हमें हिसाब देना है, उनकी दृष्टि से कोई भी प्राणी छिपा नहीं है—सभी वस्तुएं उनके सामने साफ़ और खुली हुई हैं ।” (इब्रानीयों ४:१३, SHB)
याहुवाह प्रेम हैं। याहुवाह न्यायी हैं। न्यायी और करूणामय परम पिता होने के नाते, आपने बच्चों से जो धरती से संबंध रखते हैं, उनसे असंभव की अपेक्षा नहीं करता। वो जानते हैं कि आपको विरासत में मिली पाप करने की प्रवृत्ति पर अपने बल से जय नहीं प्राप्त कर सकते। यहीं पर कई सारे लोग असफल हो जाते हैं। जब वे लोग पहले बार मसीही बने थे, तो तब उन्होंने पिछले पापों के लिए विश्वास के साथ याहुवाह की क्षमा को स्वीकार किया था। लेकिन दैनिक जीवन में निरंतर विजय प्राप्त करने में असफल हो जाते हैं क्योंकि वे अचानक से ऐसा जीना शुरू करते देते हैं कि जीत उन पर निर्भर है। यह उन पर निर्भर नहीं हैं। जो लोग पाप पर विजय प्राप्त करने के लिए अपने इच्छा शक्ति पर निर्भर होते उन लोगों को असफलता ही मिलेगी।
पाप पर वीजयी प्राप्त करने का रहस्य फिल्लीप्पी ४:१३ में दर्ज है: “जो मुझे सामर्थ प्रदान करते हैं, उनमें मैं सब कुछ करने में सक्षम हूँ।” (सरल हिन्दी बाइबिल)। पाप के बाद आदम की प्रवृत्ति को अपने उपर लेने के बाद भी याहुशुआ एक परिपूण जीवन जीते हुए शरीर में पाप को दण्डित किया। इस प्रकार, उन्होंने उन सभी के लिए जीत सुनिश्चित किया जो विश्वास से उनकी जीत को अपना लेते हैं।
यह सही ही था कि परमेश्वर, जिनके लिए तथा जिनके द्वारा हर एक वस्तु का अस्तित्व है, अनेक सन्तानों को महिमा में प्रवेश कराने के द्वारा उनके उद्धारकर्ता को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध बनाएँ। जो पवित्र करते हैं तथा वे सभी, जो पवित्र किए जा रहे हैं, दोनों एक ही पिता की सन्तान हैं। यही कारण है कि वह उन्हें भाई कहते हुए लज्जित नहीं होते।
क्योंकि संतान माँस और लहू युक्त थी इसलिए वह भी उनकी इस मनुष्यता में सहभागी हो गया ताकि अपनी मृत्यु के द्वारा वह उसे अर्थात् शैतान को नष्ट कर सके जिसके पास मारने की शक्ति है। और उन व्यक्तियों को मुक्त कर ले जिनका समूचा जीवन मृत्यु के प्रति अपने भय के कारण दासता में बीता है। क्योंकि यह निश्चित है कि वह स्वर्गदूतों की नहीं बल्कि इब्राहीम के वंशजों की सहायता करता है। इसलिए उसे हर प्रकार से उसके भाईयों के जैसा बनाया गया ताकि वह परमेश्वर की सेवा में दयालु और विश्वसनीय महायाजक बन सके। और लोगों को उनके पापों की क्षमा दिलाने के लिए बलि दे सके। क्योंकि उसने स्वयं उस समय, जब उसकी परीक्षा ली जा रही थी, यातनाएँ भोगी हैं। इसलिए जिनकी परीक्षा ली जा रही है, वह उनकी सहायता करने में समर्थ है।
संपूर्ण और पूरी मदद उन सभी को प्रदान की जाएगी जो अपना सब कुछ उनके सृष्टिकर्ता के हाथ में सौंपते हैं। यिर्मयाह में एक खूबसूरत वादा उन सब के लिए है जो विश्वास के द्वारा पाप पर याहुशुआ की जीत को अपनाते हैं: “परन्तु जो वाचा मैं उन दिनों के बाद इस्राएल के घराने से बाँधूँगा, वह यह है : मैं अपनी व्यवस्था उनके मन में समवाऊँगा, और उसे उनके हृदय पर लिखूँगा; और मैं उनका परमेश्वर ठहरूँगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे, यहोवा की यह वाणी है। (यिर्मयाह ३१:३३, ERV-HI )
याहुवाह को उनके वचन पर लिजिए। आज ही उस उद्धार को स्वीकार करना चुने जो उन्होंने आपके लिए उपलब्ध किया है।“विश्वासी व्यक्ति के लिए सब कुछ संभव है।” (मारकुस ९:२३, ERV-HI)

धर्मशास्त्र लोगों
के एक बहुत ही अधिक विशेष समूह को प्रस्तुत करता है जो अपने सृष्टिकर्ता का आदर
उसके पवित्र सब्त पर उसकी उपासना द्वारा करते हैं जबकि शेष संसार इसका तिरस्कार
करता है. ये सादोक के पुत्र कहलाते हैं. सादोक के पुत्र अनूठे हैं. उन्होंने अपने
जीवनों को यहुवाह को ऐसे समर्पित कर दिया है की उनकी इच्छा उसकी इच्छा में समाहित
हो गई हैं. उनके जीवन पवित्र प्रतिबिम्ब को पूर्णत: दर्शाते हैं. सादोक के पुत्र
जैसा यहुवाह निर्देशित करता है वैसे ही पहनते, बात-चीत करते और कार्य करते हैं. वे
उसके हैं और वह उनका है. जब वे अपने पड़ोसी की सेवा करते हैं, एक बहुत ही विशेष
अर्थ में, सादोक के पुत्र यहुवाह की सेवा करते हैं.
“फिर लेवीय याजक जो
सादोक की सन्तान हैं . . . वे मेरी सेवा करने को मेरे समीप आया करें . . .
परमेश्वर यहुवाह की यही वाणी है. वे मेरे पवित्र स्थान में आया करें, और मेरी मेज
के पास मेरी सेवा टहल करने को आएँ और मेरी वस्तुओं की रक्षा करें.
“जब कोई मुकद्धमा हो
तब न्याय करने को भी वे ही बैठें, और मेरे नियमों के अनुसार न्याय करें. मेरे सब
नियत पर्बों के विषय भी वे मेरी व्यवस्था और विधियों का पालन करें और मेरे सब्त को
पवित्र मानें.” (यहेजकेल ४४: १४-१६,२४)
सादोक के पुत्रों के
लिए बड़ी बुलाहट है. हमेशा ही ऐसे लोग बहुत थोड़े ही रहे हैं जो संपूर्ण रूप से
सर्वोच्च को समर्पित हैं, वे शाश्वत के साथ एक हैं. वचन जो वे बोलते हैं और कार्य
जो वे करते है, उसकी जिससे वे प्रेम करते और सेवा करते हैं के विचार और भावनाओं का
प्रकाशन है. इतनी ऊँची नियति के लिए एक विशेष तैयारी की आवश्यकता है. यह प्रशिक्षण
सांसारिक विश्वविधालयों में नहीं पाया जा सकता. न ही कोई बाइबल स्कूल भी ठीक तरह
से यह सिखा सकता है की कौन सादोक के बेटे-बेटियाँ होंगे.
प्रत्येक स्त्री
पुरुष और बच्चे जो अपने आप को महापवित्र को समर्पित करते हैं स्वर्गीय संरक्षण में
आ जाते हैं. यहुवाह स्वयं उनके जीवन के अनुभवों को निर्देशित करता है जो यहुवाह की
सेवकाई के बड़े कार्यो के लिए उनके चरित्र को बनाता है. सादोक के पुत्र और
पुत्रियों का जीवन सम्पन्न होता है, संतोषप्रद, आत्मिक वरदानों से भरा हुआ. .
.परन्तु यह एक बहुत सी निराला आचरण होता है. मूसा ने यहुवाह का प्रवक्ता होने के
पहले निर्जन प्रदेश में ४० वर्ष बिताए. स्वर्गीय स्कूल में इन ४० वर्षो की
ट्रेनिंग ने उसे उसके जीवन के महान कार्य के लिए तैयार किया. मूसा का स्वर्ग में
बहुत आदर किया गया. जब उसने यहुवाह का मुख देखना चाहा, सर्वशक्तिमान का शालीनता से
प्रत्युत्तर था:
“मैं तेरे सम्मुख
होकर चलते हुए तुझे अपनी सारी भलाई दिखाऊंगा ….परन्तु … तू मेरे मुख का दर्शन
नहीं कर सकता; क्योंकि मनुष्य मेरे मुख का दर्शन करके जीवित नहीं रह सकता. …सुन
मेरे पास एक स्थान है यहाँ तू उस चट्टान पर खड़ा हो…और जब तक मेरा तेज तेरे सामने
हो के चलता रहे, तब तक मैं तुझे चट्टान की दरार में रखूँगा और जब तक मैं तेरे
सामने से होकर न निकल जाऊ तब तक अपने हाथ से तुझे ढाँपे रहूँगा. फिर मैं अपना हाथ
उठा लूँगा, तब तू मेरी पीठ का तो दर्शन पाएगा; परन्तु मेरे मुख का दर्शन नहीं
मिलेगा.” (निर्गमन ३३:१८-२३)
यहुवाह में सादोक के
पुत्र से यह कहा:
“यदि तुम में कोई
नबी हो तो उस पर मैं यहुवाह दर्शन के द्वारा अपने आप को प्रगट करूँगा; या स्वप्न
में उससे बातें करूँगा. परन्तु मेरा दास मूसा ऐसा नहीं है; वह तो मेरे सब घरानों
में विश्वासयोग्य है. उससे मैं गुप्त रीति से नहीं, परन्तु आमने-सामने और
प्रत्यक्ष होकर बातें करता हूँ; और वह यहुवाह का स्वरूप निहारने पाता है.” (गिनती
१२:६-८)
उस बड़ी बुलाहट के
लिए मूसा की तैयारी मिस्त्र के रायल कोर्ट में संसार के सर्वोत्तम शिक्षा विदों के
द्वारा नहीं हुई. यह मरुस्थल के निराले बंजर स्थान में प्राप्त हुई, जहाँ उसकी
आत्मा उसके बनाने वाले के साथ आमने-सामने बातचीत कर रही थी. यही वह तैयारी है जो
उन सभी के लिए आवश्यक है जो सादोक के पुत्र होंगे. यह संसार के आदर से या कलीसिया
के आसनों पर विराजमान प्रशनयोग्य सहभागिता
रखने वाले जो की यहुवाह के लिए जीने के लिए पूर्णत: समर्पित नहीं है, से दूर एक
विशेष एकाकी राह है.
वे सभी जो अपने आप
को पूर्णतया यहुवाह को समर्पित करते हैं, पवित्र व्यवस्था की सभी तफसील चौथी आज्ञा
सब्त का पालन करने में आज्ञाकारी रहेंगे. इस बिंदु पर जल्द से जल्द आज्ञाकारिता
पेश की जाती है, तौभी प्रत्येक को अकेला ही खड़ा रहना होता है. सातवाँ दिन सब्त की
गणना केवल प्राचीन चन्द्र-सौर कैलेन्डर के उपयोग के द्वारा ही की जा सकती है. यह
पुरोहितों, पासतरों, दोस्तों और परिवार में एक समान नितांत अलोकप्रिय है. वे सभी
जो सृष्टिकर्ता के
 |
|
उस बड़ी बुलाहट के लिए मूसा की तैयारी मिस्त्र के रायल कोर्ट
में संसार के सर्वोत्तम शिक्षा
विदों के द्वारा नहीं हुई. यह मरुस्थल के निराले बंजर स्थान
में प्राप्त हुई जहाँ उसकी आत्मा
उसके बनाने वाले के
साथ आमने-सामने बातचीत कर रही थी.
|
सब्त पर उसकी उपासना के दायित्व को अस्वीकार करते हैं, वे उनके
विरुद्ध जो आज्ञापालन करते है उठ खड़े होंगे. यह हमेशा ही उनके जो यहुवाह की सेवा
करते और नहीं करते के बीच होता है. परिणामस्वरूप आधुनिक सादोक के पुत्रों को उनके
समय पूर्व भाई-बहनों के समान एकांत में उपासना करना चाहिए. पहले पहल यह गलत महसूस होगा.
जब एक मनुष्य जिसे
सुन्दर रंगीन काँच की खिडकियों के नीचे प्रेरणादायक उपदेश सुनने,
और ऊँचा संगीत सुनने
की आदत हो उसे झील का किनारा कुछ कम “उपासनापूर्ण” प्रतीत होगा. जब एक स्त्री को
चर्च सर्विस के बाद डिनर में भाग लेने, बच्चों के सब्त स्कूल में पढ़ाने, और
प्रार्थना सभाओं में भाग लेने की आदत हो जाती है, तब अपने बेडरूम में एकाकी उपासना
जबरदस्त एकाकी लगती है. मनुष्यों के द्वारा बनाई गई उपासना की आदतें आवश्यक नहीं
है की सृष्टिकर्ता को गौरवान्वित करें. भीड़ से भरी हुई कलीसिया के सामने सुन्दरता
से गाया गया गीत यहुवाह के कानों तक नहीं पहुँचता यदि वह स्व-प्रशंसा से भरा हो. साधारण
गीत जो अकेले किसी के अपने घर में एकांत में गाया गया हो, यदि समर्पित प्रेमी हृदय
से प्रवाहित हुआ है तो, यहुवाह की आशीषों को पाता है. स्वर्गदूत, ऐसे गीत को
सुनकर, अपनी आवाजों को उस नम्र विश्वासी के साथ मिला देते है और कोरस एक बड़े राग
को दुहराने के द्वारा स्वर्ग के कोनेकोने में गूंजते हुए और महिमा को लाते हुए
अपने प्रिय को आदर देते हुए उमड़ पड़ता है.
इस पेशोपेश में मत
पड़िए की आपकी एकांत में की गई उपासना किसी भी प्रकार उससे जबकि आप सैकड़ों के साथ
घुटने टेक रहे हैं या गा रहे हैं से यहुवाह के समक्ष कम मूल्य की है. यह व्यक्तिगत
हृदय है जो यहुवाह को ग्रहण करता है, और वह व्यक्तिगत रूप से उस व्यक्ति के पास
आता है. धर्मशास्त्र उन सभों के लिए जो अकेले उपासना करते हैं आशा प्रदान करता है:
“जहाँ दो या तीन
मेरे नाम पर इकठ्ठा होते हैं. वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ.” (मत्ती १८:२०)
यह उन्हें अलग नहीं
करता जिनके पास दूसरा व्यक्ति नहीं है जिसके साथ वे उपासना कर सकें. यहुवाह
स्वर्गदूतों को नियुक्त करता है जो अपने धरती से जुड़े पुत्रों के संरक्षण के लिए
उनके साथ कदम से कदम मिला कर चलते हैं. यहुशुआ ने इन व्यक्तिगत संरक्षक
स्वर्गदूतों के बारे में संदर्भित किया जबकि उसने सावधान किया कि:
“देखो तुम इन छोटों में
से किसी को तुच्छ न जानना, क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ की स्वर्ग में इनके दूत
मेरे स्वर्गीय पिता का मुँह सदा देखते हैं.” (मत्ती १८:१०)
स्वर्गदूत यहुवाह के
बच्चों के साथ जंगल मार्ग में, बालू के किनारों पर, या एक शांत कमरे में सदा साथ
रहते हैं.
“क्या वे सब (स्वर्गदूत)
सेवा-टहल करने वाली आत्माएं नहीं, जो उद्धार पाने वालों के लिए सेवा करने को भेजी
जाती हैं.” (इब्रानियों १:१४)
एक विनम्र होम चर्च,
बहुतों या एक के साथ, उनके लिये जो विश्वास की बहुतायत के साथ उसमे रहते हैं एक महल
के समान प्रतीत होता है. क्योंकि सच्ची उपासना एक भक्तिपूर्वक कार्य है जो प्रेम
और कृतज्ञता से भरे हृदय से उत्पन्न होता है, वास्तव में एकांत में उपासना करना
लापरवाह और उदासीन लोगों के साथ की तुलना में अधिक आसान है. धर्मशास्त्र किस
प्रकार उपासना होनी चाहिए आज्ञा नहीं देता है. कुछ भी जो मन और मस्तिष्क को अपने
बनाने वाले के प्रेम औए निष्ठा में लाता है उपासना किये जाने के लिए स्वीकार्य है.
“सब्त का दिन मनुष्य
के लिए बनाया गया है न कि मनुष्य सब्त के लिए.” (मरकुस २:२७)
सहर्ष नई चीजों को
अपनी उपासना के लिए आजमाइए. जो एक भीड़ के लिए सम्भव है वह एक परिवार या एक व्यक्ति
के लिए सम्भव नहीं भी हो सकता है. हालाँकि यह हृदय पर प्रभाव को कमजोर नहीं करता
है और नाही यह यहुवाह को कम ग्रहण योग्य है सिर्फ इसलिए कि यह एक व्यक्ति या
परिवार से होती है बजाय इसके की एक भीड़ भरे चर्च के द्वारा. यथासम्भव पवित्र समय
को प्रकृति में व्यतीत करें. यह उन महान मार्गों में से एक होगा जो हृदय को ऊपर
स्वर्ग की ओर उठाएगा.
एलिय्याह सादोक का
एक अन्य पुत्र था जिसने स्वर्गीय स्कूल में अपने जीवन के कार्य की तैयारी में एकाकी
जीवन व्यतीत किया. यहुवाह ने व्यक्तिगत रूप से उसे निर्देशित किया कि वह जो ऊँचा
और उत्कृष्ट है जो अनन्त में निवास करता है वह अन्धी, भूकम्प, या आग में नहीं पाया
जाता. ना ही बड़े हुल्लड़ या अशांत कार्य के द्वारा मनुष्य की सहभागिता पवित्रता के
साथ हो सकती है. यहुवाह ने एलिय्याह से “दबे हुए धीमे शब्द” से कहा (१ राजा १९:१२)
इस प्रकार की दबी और धीमी आवाज सुनी नहीं जा सकती जब उपासना परम्पराओं के नीचे दफन
हो या दूसरों की अपेक्षाओं से बंधी हो. यह आधुनिक समाज के हो-हल्ले से बहुत दूर
है, अविश्वासियों के मन बहलाव से दूर है, ताकि हृदय परमप्रिय की आवाज को अच्छे से
सुन सके. विश्व के सृष्टिकर्ता के साथ
सहभागिता के ये क्षण, ही हैं जो सादोक के पुत्र और पुत्रियों को तैयार करते हैं की
वे स्वर्ग के राज्य की गवाही देने के लिए पृथ्वी पर स्थिर रहें.
यहुशुआ ने स्वयं भी उनके लिए जो सर्वशक्तिमान के
समक्ष एक शांत एकाकी उपासना में झुकते हैं बड़े आत्मिक प्रतिफल को संदर्भित किया
है. “परन्तु जब तू प्रार्थना करे तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने
पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे
प्रतिफल देगा.”(मत्ती ६:६)
अपने पिता को जो
स्वर्ग में है अपनी स्तुति और प्रार्थनाओं को चढाएँ. उसके आपके लिए प्रेम के
आश्वासन में, उसके द्वारा आपकी उपासना को ग्रहण करने में विश्राम करें.
अत: अब जो यहुशुआ
में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं. क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के
अनुसार चलते हैं. (रोमियो ८:१)
सृष्टिकर्ता की
उपासना आत्मा और सच्चाई से उसके पवित्र सब्त के दिनों में करिये. वह आपको प्रेम
करता है एक ऐसे प्रेम के साथ जो आपको कभी अलग नहीं होने देगा. आपकी साधारण और
एकाकी उपासना जो संसारिकता से दूर है उसकी दृष्टि में ग्रहण योग्य है.
उसके वचन आपको
निमन्त्रण दे रहे हैं:
“हे मेरी प्रिय, हे
मेरी सुन्दरी, उठकर चली जा; हे मेरे प्रेमी, आ, हम खेतों में निकल जाएँ और गावों
में रहें; फिर सबेरे उठकर दाख की बारियों में चलें,…वहाँ मैं तुमको अपना प्रेम
दिखाउंगी.” श्रेष्ठगीत (२:१०,७:११,१२)
धर्मशास्त्र लोगों
के एक बहुत ही अधिक विशेष समूह को प्रस्तुत करता है जो अपने सृष्टिकर्ता का आदर
उसके पवित्र सब्त पर उसकी उपासना द्वारा करते हैं जबकि शेष संसार इसका तिरस्कार
करता है. ये सादोक के पुत्र कहलाते हैं. सादोक के पुत्र अनूठे हैं. उन्होंने अपने
जीवनों को यहुवाह को ऐसे समर्पित कर दिया है की उनकी इच्छा उसकी इच्छा में समाहित
हो गई हैं. उनके जीवन पवित्र प्रतिबिम्ब को पूर्णत: दर्शाते हैं. सादोक के पुत्र
जैसा यहुवाह निर्देशित करता है वैसे ही पहनते, बात-चीत करते और कार्य करते हैं. वे
उसके हैं और वह उनका है. जब वे अपने पड़ोसी की सेवा करते हैं, एक बहुत ही विशेष
अर्थ में, सादोक के पुत्र यहुवाह की सेवा करते हैं.
“फिर लेवीय याजक जो
सादोक की सन्तान हैं . . . वे मेरी सेवा करने को मेरे समीप आया करें . . .
परमेश्वर यहुवाह की यही वाणी है. वे मेरे पवित्र स्थान में आया करें, और मेरी मेज
के पास मेरी सेवा टहल करने को आएँ और मेरी वस्तुओं की रक्षा करें.
“जब कोई मुकद्धमा हो
तब न्याय करने को भी वे ही बैठें, और मेरे नियमों के अनुसार न्याय करें. मेरे सब
नियत पर्बों के विषय भी वे मेरी व्यवस्था और विधियों का पालन करें और मेरे सब्त को
पवित्र मानें.” (यहेजकेल ४४: १४-१६,२४)
सादोक के पुत्रों के
लिए बड़ी बुलाहट है. हमेशा ही ऐसे लोग बहुत थोड़े ही रहे हैं जो संपूर्ण रूप से
सर्वोच्च को समर्पित हैं, वे शाश्वत के साथ एक हैं. वचन जो वे बोलते हैं और कार्य
जो वे करते है, उसकी जिससे वे प्रेम करते और सेवा करते हैं के विचार और भावनाओं का
प्रकाशन है. इतनी ऊँची नियति के लिए एक विशेष तैयारी की आवश्यकता है. यह प्रशिक्षण
सांसारिक विश्वविधालयों में नहीं पाया जा सकता. न ही कोई बाइबल स्कूल भी ठीक तरह
से यह सिखा सकता है की कौन सादोक के बेटे-बेटियाँ होंगे.
प्रत्येक स्त्री
पुरुष और बच्चे जो अपने आप को महापवित्र को समर्पित करते हैं स्वर्गीय संरक्षण में
आ जाते हैं. यहुवाह स्वयं उनके जीवन के अनुभवों को निर्देशित करता है जो यहुवाह की
सेवकाई के बड़े कार्यो के लिए उनके चरित्र को बनाता है. सादोक के पुत्र और
पुत्रियों का जीवन सम्पन्न होता है, संतोषप्रद, आत्मिक वरदानों से भरा हुआ. .
.परन्तु यह एक बहुत सी निराला आचरण होता है. मूसा ने यहुवाह का प्रवक्ता होने के
पहले निर्जन प्रदेश में ४० वर्ष बिताए. स्वर्गीय स्कूल में इन ४० वर्षो की
ट्रेनिंग ने उसे उसके जीवन के महान कार्य के लिए तैयार किया. मूसा का स्वर्ग में
बहुत आदर किया गया. जब उसने यहुवाह का मुख देखना चाहा, सर्वशक्तिमान का शालीनता से
प्रत्युत्तर था:
“मैं तेरे सम्मुख
होकर चलते हुए तुझे अपनी सारी भलाई दिखाऊंगा ….परन्तु … तू मेरे मुख का दर्शन
नहीं कर सकता; क्योंकि मनुष्य मेरे मुख का दर्शन करके जीवित नहीं रह सकता. …सुन
मेरे पास एक स्थान है यहाँ तू उस चट्टान पर खड़ा हो…और जब तक मेरा तेज तेरे सामने
हो के चलता रहे, तब तक मैं तुझे चट्टान की दरार में रखूँगा और जब तक मैं तेरे
सामने से होकर न निकल जाऊ तब तक अपने हाथ से तुझे ढाँपे रहूँगा. फिर मैं अपना हाथ
उठा लूँगा, तब तू मेरी पीठ का तो दर्शन पाएगा; परन्तु मेरे मुख का दर्शन नहीं
मिलेगा.” (निर्गमन ३३:१८-२३)
यहुवाह में सादोक के
पुत्र से यह कहा:
“यदि तुम में कोई
नबी हो तो उस पर मैं यहुवाह दर्शन के द्वारा अपने आप को प्रगट करूँगा; या स्वप्न
में उससे बातें करूँगा. परन्तु मेरा दास मूसा ऐसा नहीं है; वह तो मेरे सब घरानों
में विश्वासयोग्य है. उससे मैं गुप्त रीति से नहीं, परन्तु आमने-सामने और
प्रत्यक्ष होकर बातें करता हूँ; और वह यहुवाह का स्वरूप निहारने पाता है.” (गिनती
१२:६-८)
उस बड़ी बुलाहट के
लिए मूसा की तैयारी मिस्त्र के रायल कोर्ट में संसार के सर्वोत्तम शिक्षा विदों के
द्वारा नहीं हुई. यह मरुस्थल के निराले बंजर स्थान में प्राप्त हुई, जहाँ उसकी
आत्मा उसके बनाने वाले के साथ आमने-सामने बातचीत कर रही थी. यही वह तैयारी है जो
उन सभी के लिए आवश्यक है जो सादोक के पुत्र होंगे. यह संसार के आदर से या कलीसिया
के आसनों पर विराजमान प्रशनयोग्य सहभागिता
रखने वाले जो की यहुवाह के लिए जीने के लिए पूर्णत: समर्पित नहीं है, से दूर एक
विशेष एकाकी राह है.
वे सभी जो अपने आप
को पूर्णतया यहुवाह को समर्पित करते हैं, पवित्र व्यवस्था की सभी तफसील चौथी आज्ञा
सब्त का पालन करने में आज्ञाकारी रहेंगे. इस बिंदु पर जल्द से जल्द आज्ञाकारिता
पेश की जाती है, तौभी प्रत्येक को अकेला ही खड़ा रहना होता है. सातवाँ दिन सब्त की
गणना केवल प्राचीन चन्द्र-सौर कैलेन्डर के उपयोग के द्वारा ही की जा सकती है. यह
पुरोहितों, पासतरों, दोस्तों और परिवार में एक समान नितांत अलोकप्रिय है. वे सभी
जो सृष्टिकर्ता के सब्त पर उसकी उपासना के दायित्व को अस्वीकार करते हैं, वे उनके
विरुद्ध जो आज्ञापालन करते है उठ खड़े होंगे. यह हमेशा ही उनके जो यहुवाह की सेवा
करते और नहीं करते के बीच होता है. परिणामस्वरूप आधुनिक सादोक के पुत्रों को उनके
समय पूर्व भाई-बहनों के समान एकांत में उपासना करना चाहिए. पहले पहल यह गलत महसूस होगा.
जब एक मनुष्य जिसे
सुन्दर रंगीन काँच की खिडकियों के नीचे प्रेरणादायक उपदेश सुनने,
और ऊँचा संगीत सुनने
की आदत हो उसे झील का किनारा कुछ कम “उपासनापूर्ण” प्रतीत होगा. जब एक स्त्री को
चर्च सर्विस के बाद डिनर में भाग लेने, बच्चों के सब्त स्कूल में पढ़ाने, और
प्रार्थना सभाओं में भाग लेने की आदत हो जाती है, तब अपने बेडरूम में एकाकी उपासना
जबरदस्त एकाकी लगती है. मनुष्यों के द्वारा बनाई गई उपासना की आदतें आवश्यक नहीं
है की सृष्टिकर्ता को गौरवान्वित करें. भीड़ से भरी हुई कलीसिया के सामने सुन्दरता
से गाया गया गीत यहुवाह के कानों तक नहीं पहुँचता यदि वह स्व-प्रशंसा से भरा हो. साधारण
गीत जो अकेले किसी के अपने घर में एकांत में गाया गया हो, यदि समर्पित प्रेमी हृदय
से प्रवाहित हुआ है तो, यहुवाह की आशीषों को पाता है. स्वर्गदूत, ऐसे गीत को
सुनकर, अपनी आवाजों को उस नम्र विश्वासी के साथ मिला देते है और कोरस एक बड़े राग
को दुहराने के द्वारा स्वर्ग के कोनेकोने में गूंजते हुए और महिमा को लाते हुए
अपने प्रिय को आदर देते हुए उमड़ पड़ता है.
इस पेशोपेश में मत
पड़िए की आपकी एकांत में की गई उपासना किसी भी प्रकार उससे जबकि आप सैकड़ों के साथ
घुटने टेक रहे हैं या गा रहे हैं से यहुवाह के समक्ष कम मूल्य की है. यह व्यक्तिगत
हृदय है जो यहुवाह को ग्रहण करता है, और वह व्यक्तिगत रूप से उस व्यक्ति के पास
आता है. धर्मशास्त्र उन सभों के लिए जो अकेले उपासना करते हैं आशा प्रदान करता है:
“जहाँ दो या तीन
मेरे नाम पर इकठ्ठा होते हैं. वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ.” (मत्ती १८:२०)
यह उन्हें अलग नहीं
करता जिनके पास दूसरा व्यक्ति नहीं है जिसके साथ वे उपासना कर सकें. यहुवाह
स्वर्गदूतों को नियुक्त करता है जो अपने धरती से जुड़े पुत्रों के संरक्षण के लिए
उनके साथ कदम से कदम मिला कर चलते हैं. यहुशुआ ने इन व्यक्तिगत संरक्षक
स्वर्गदूतों के बारे में संदर्भित किया जबकि उसने सावधान किया कि:
“देखो तुम इन छोटों में
से किसी को तुच्छ न जानना, क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ की स्वर्ग में इनके दूत
मेरे स्वर्गीय पिता का मुँह सदा देखते हैं.” (मत्ती १८:१०)
स्वर्गदूत यहुवाह के
बच्चों के साथ जंगल मार्ग में, बालू के किनारों पर, या एक शांत कमरे में सदा साथ
रहते हैं.
“क्या वे सब (स्वर्गदूत)
सेवा-टहल करने वाली आत्माएं नहीं, जो उद्धार पाने वालों के लिए सेवा करने को भेजी
जाती हैं.” (इब्रानियों १:१४)
एक विनम्र होम चर्च,
बहुतों या एक के साथ, उनके लिये जो विश्वास की बहुतायत के साथ उसमे रहते हैं एक महल
के समान प्रतीत होता है. क्योंकि सच्ची उपासना एक भक्तिपूर्वक कार्य है जो प्रेम
और कृतज्ञता से भरे हृदय से उत्पन्न होता है, वास्तव में एकांत में उपासना करना
लापरवाह और उदासीन लोगों के साथ की तुलना में अधिक आसान है. धर्मशास्त्र किस
प्रकार उपासना होनी चाहिए आज्ञा नहीं देता है. कुछ भी जो मन और मस्तिष्क को अपने
बनाने वाले के प्रेम औए निष्ठा में लाता है उपासना किये जाने के लिए स्वीकार्य है.
“सब्त का दिन मनुष्य
के लिए बनाया गया है न कि मनुष्य सब्त के लिए.” (मरकुस २:२७)
सहर्ष नई चीजों को
अपनी उपासना के लिए आजमाइए. जो एक भीड़ के लिए सम्भव है वह एक परिवार या एक व्यक्ति
के लिए सम्भव नहीं भी हो सकता है. हालाँकि यह हृदय पर प्रभाव को कमजोर नहीं करता
है और नाही यह यहुवाह को कम ग्रहण योग्य है सिर्फ इसलिए कि यह एक व्यक्ति या
परिवार से होती है बजाय इसके की एक भीड़ भरे चर्च के द्वारा. यथासम्भव पवित्र समय
को प्रकृति में व्यतीत करें. यह उन महान मार्गों में से एक होगा जो हृदय को ऊपर
स्वर्ग की ओर उठाएगा.

एलिय्याह सादोक का
एक अन्य पुत्र था जिसने स्वर्गीय स्कूल में अपने जीवन के कार्य की तैयारी में एकाकी
जीवन व्यतीत किया. यहुवाह ने व्यक्तिगत रूप से उसे निर्देशित किया कि वह जो ऊँचा
और उत्कृष्ट है जो अनन्त में निवास करता है वह अन्धी, भूकम्प, या आग में नहीं पाया
जाता. ना ही बड़े हुल्लड़ या अशांत कार्य के द्वारा मनुष्य की सहभागिता पवित्रता के
साथ हो सकती है. यहुवाह ने एलिय्याह से “दबे हुए धीमे शब्द” से कहा (१ राजा १९:१२)
इस प्रकार की दबी और धीमी आवाज सुनी नहीं जा सकती जब उपासना परम्पराओं के नीचे दफन
हो या दूसरों की अपेक्षाओं से बंधी हो. यह आधुनिक समाज के हो-हल्ले से बहुत दूर
है, अविश्वासियों के मन बहलाव से दूर है, ताकि हृदय परमप्रिय की आवाज को अच्छे से
सुन सके. विश्व के सृष्टिकर्ता के साथ
सहभागिता के ये क्षण, ही हैं जो सादोक के पुत्र और पुत्रियों को तैयार करते हैं की
वे स्वर्ग के राज्य की गवाही देने के लिए पृथ्वी पर स्थिर रहें.
यहुशुआ ने स्वयं भी उनके लिए जो सर्वशक्तिमान के
समक्ष एक शांत एकाकी उपासना में झुकते हैं बड़े आत्मिक प्रतिफल को संदर्भित किया
है. “परन्तु जब तू प्रार्थना करे तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने
पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे
प्रतिफल देगा.”(मत्ती ६:६)
अपने पिता को जो
स्वर्ग में है अपनी स्तुति और प्रार्थनाओं को चढाएँ. उसके आपके लिए प्रेम के
आश्वासन में, उसके द्वारा आपकी उपासना को ग्रहण करने में विश्राम करें.
अत: अब जो यहुशुआ
में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं. क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के
अनुसार चलते हैं. (रोमियो ८:१)
सृष्टिकर्ता की
उपासना आत्मा और सच्चाई से उसके पवित्र सब्त के दिनों में करिये. वह आपको प्रेम
करता है एक ऐसे प्रेम के साथ जो आपको कभी अलग नहीं होने देगा. आपकी साधारण और
एकाकी उपासना जो संसारिकता से दूर है उसकी दृष्टि में ग्रहण योग्य है.
उसके वचन आपको
निमन्त्रण दे रहे हैं:
“हे मेरी प्रिय, हे
मेरी सुन्दरी, उठकर चली जा; हे मेरे प्रेमी, आ, हम खेतों में निकल जाएँ और गावों
में रहें; फिर सबेरे उठकर दाख की बारियों में चलें,…वहाँ मैं तुमको अपना प्रेम
दिखाउंगी.” श्रेष्ठगीत (२:१०,७:११,१२)
सातवाँ दिन सब्त
पवित्र व्यवस्था के रूप में सभी लोगों पर निरन्तर बन्धनकारी है. सारी आज्ञाओं में
से कोई और आज्ञा प्राय: निर्भयता से नहीं तोड़ी जाती जैसे की चौथी आज्ञा.
मसीही जन जो मूर्तियों की पूजा, शपथ खाना, झूठ बोलना, खून
करना, या व्यभिचार करने के बारे में स्वप्न भी नहीं देखते वे सब्त की आज्ञा को
तोड़ने से नहीं हिचकिचाते. शैतान ने सभी लोगो को किसी प्रकार से यह विश्वास करने के लिए धोखा
दिया कि सब्त “केवल यहूदियों के लिए” है और यह “क्रूस पर चढ़ा दिया गया” है. सातवें
दिन सब्त को छोडकर, संसार के बहुत से मसीही लोग रविवार के दिन को यह मानते हुए कि यीशु
उस दिन मृतकों में से जी उठा था उपासना करते हैं. यह तर्क धर्मशास्त्र का विरोध
करता है जो सिखाता है कि एलोहीम आज कल और सर्वदा एक सा है. (इब्रानियों १३:८)
पवित्र व्यवस्था का देने वाला घोषणा करता है: मैं याहुवाह बदलता नहीं (देखिये
मलाकी ३:६) और आगे धर्मशास्त्र यह सिखाता है कि कोई चाहे व्यक्ति कितनी भी
सावधानीपूर्वक व्यवस्था का पालन करे, लेकिन यदि वह एक को भी तोड़ता है, तो वह सारी
व्यवस्था के तोड़ने का अपराधी होता है!
“क्योंकि जो कोई सारी व्यवस्था का पालन करता है परन्तु एक
ही बात में चुक जाए तो वह सब बातों में दोषी ठहर चुका है. इसलिए कि जिसने यह कहा,
तू व्यभिचार न करना उसी ने यह भी कहा तू हत्या न करना, इसीलिए यदि तूने व्यभिचार
तो नहीं किया पर हत्या की तौभी तू व्यवस्था का उल्लंघन करनेवाला ठहरा.” (याकूब
२:१०,११)
वह व्यक्ति जो सारी व्यवस्था का पालन करता है परन्तु सब्त
को तोड़ता है, वह भी व्यवस्था को तोड़ता है!
याहुवाह की इच्छा है कि सभी उसकी व्यवस्था का पालन करें, न
केवल यहूदी ही. सब्त २००० वर्षों से भी अधिक से इससे पहले जबकि इस्राएल राज्य हुआ
एक शाश्वत व्यवस्था था! सब्त की स्थापना सृष्टि के समय की गई, नाकि निर्गमन के
समय. यह सृष्टि की यादगार है क्योंकि इसकी स्थापना के साथ सृष्टि के पूर्ण होने
वाला सप्ताह जुड़ा हुआ है.
“यों आकाश और
पृथ्वी और सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया. और याहुवाह ने अपना काम जिसे वह करता
था सातवें दिन समाप्त किया, और उसने अपने किये हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम
किया. और याहुवाह ने सातवें दिन को आशीष दो और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने
सृष्टि की रचना के अपने सारे काम से विश्राम लिया.” (उत्पत्ति २:१-३)
सृष्टि के समय स्थापना के बाद, सब्त क्रूस पर नहीं चढाया जा
सकता, नाही यह यहूदियों की एकमात्र सम्पत्ति हो सकता है. प्रलय के बाद, संसार बहुत
जल्द ही स्वधर्म त्याग और मूर्तिपूजा में फिर से डूब गया. केवल कुछ ही स्वर्गीय
सिद्धान्तों में बने रहे. याहुवाह ने अब्राहम को जाति का पूर्वज होने के लिए चुना
जिसके द्वारा मसीहा का जन्म होना था.
“याहुवाह ने अब्राहम से कहा . . . मैं तुझ से एक बड़ी जाति
बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम महान करूँगा और तू आशीष का मूल होगा . .
. और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे.” (उत्पत्ति २१:१-३)
इस्राएल राष्ट्र का आदर अब्राहम का वंश होने के कारण पृथ्वी
के सभी राष्ट्रों से जिन्होंने स्वर्ग से विद्रोह किया के उपर किया गया. उन्हें
पवित्र व्यवस्था को इसे सुरक्षित रखने वाले जानकर सौपा गया था. मिस्त्र में लम्बे
समय तक बन्धक रहने के कारण, इस्राएलियों ने सब्त को लगभग खो दिया था. मूसा ने
इस्राएलियों को सिखाया कि पवित्र व्यवस्था का पालन करना उनके छुटकारे की पहली
आवश्यकता है. यही कारण था कि फिरौन ने मूसा और हारून पर गुलामों के द्वारा काम न
करने का दबाव डालने का आरोप लगाया.
“मिस्त्र के राजा ने उनसे कहा हे मूसा हे हारून, तुम क्यों
लोगों से काम छुड़वाना चाहते हो! . . . और फिरौन ने कहा सुनो इस देश में वे लोग
बहुत हो गये हैं, फिर तुम उनको परिश्रम से विश्राम दिलाना चाहते हो!” (निर्गमन
५:४-५)
“विश्राम” शब्द (Shavath #7673) की व्युत्पत्ति-विषयक निकटतम
जड़ें “सब्त” (shabbath,#7676) से है. सब्त को निर्गमन के समय एक नई आवश्यकता के रूप में नहीं प्रस्तुत किया
गया. इसे पवित्र व्यवस्था की सर्वदा बनी रहने वाली आवश्यकता के रूप में
पुनर्स्थापित किया गया.
“फिर याहुवाह ने मूसा से कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह भी
कहना निश्चय तुम मेरे विश्रामदिनों को मानना क्योंकि तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में मेरे और
तुम लोगों के बीच यह एक चिन्ह ठहरा है जिससे तुम यह बात जान रखो कि याहुवाह हमारा
पवित्र करनेहारा है. इस कारण तुम विश्रामदिन को मानना क्योंकि वह तुम्हारे लिए
पवित्र ठहरा है . . . छ: दिन तो काम काज किया जाए, पर सातवाँ दिन परम विश्राम का
दिन और याहुवाह के लिए पवित्र है . . . इसलिए इसरायली विश्रामदिन को माना करें वरन
पीढ़ी पीढ़ी में उसको सदा की वाचा का विषय जानकर माना करें. वह मेरे और इस्राएलियों
के बीच सदा एक चिन्ह रहेगा, क्योंकि छ: दिन में याहुवाह ने आकाश और पृथ्वी को
बनाया, और सातवें दिन विश्राम करके अपना जी ठन्डा किया.” (निर्गमन ३१:१२-१७)
याहुवाह ने उनके राष्ट्र को एक महत्वपूर्ण भौलोगिक स्थिति
में स्थापित किया कि वे अपने आसपास के सभी राष्ट्रों को पवित्र व्यवस्था की
बन्धनकारी आवश्यकता को सिखा सकें. दुर्भाग्यवश उन्होंने इर्षा के कारण उस व्यवस्था
को जो उन्हें दूसरों को सीखाना था रोक रखा. इस्राएलियों में यह विचार कि याहुवाह
की व्यवस्था केवल यहूदियों की ही सम्पत्ति है उत्पन्न हो गया. आज भी अपने आप को
अब्राहम की सन्तान और वाचा के उत्तराधिकारी होने का घमण्ड करते हैं. पौलुस ने इस
तर्क को अस्वीकार कर दिया. उसने रुखाई से स्पष्टतया कहा:
इसलिए कि जो इस्राएल के वंश हैं, वे सब इसरायली नहीं; और न
अब्राहम के वंश के होने के कारण सब उसकी सन्तान ठहरे . . .शरीर की सन्तान याहुवाह
की सन्तान नहीं, परन्तु प्रतिज्ञा की सन्तान वंश गिने जाते हैं . . . यहूदियों और
यूनानियों में कुछ भेद नहीं, इसलिए कि वह सबका एलोहीम है और अपने सब नाम लेनेवालों
के लिए उद्धार है. क्योंकि जो कोई याहुवाह का नाम लेगा वह उद्धार पाएगा. (देखिये
रोमियों ९:६-८, १०:१२,१३)
इसरायली वंशज जो व्यवस्था का पालन नहीं करते उन सबके साथ
नाश हो जाएँगे जो पवित्र व्यवस्था को अस्वीकार करते हैं. वे सभी जो व्यवस्था का
पालन करते हैं अब्राहम की सन्तान कहलाए जाएँगे और वाचा के अनन्त जीवन के वारिस
होंगे.
क्योंकि तुम सब उस विश्वास के द्वारा जो अभिषिक्त याहुशुआ
पर है, याहुवाह की सन्तान हो . . . अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी, न कोई दास न
स्वतंत्र, न कोई नर न नारी, क्योंकि तुम सब अभिषिक्त याहुशुआ में एक हो. और यदि
तुम याहुशुआ के हो तो अब्राहम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो.
(गलतियों ३:२६, २८-२९)
सातवाँ दिन सब्त, पवित्र व्यवस्था के सभी नियमों के समान
शाश्वत और सभी मनुष्यों के लिए बन्धनकारी है. यह अनन्तकाल तक उपासना का दिन बना
रहेगा.
“फिर ऐसा होगा, कि एक नये चाँद से दूसरे नये चाँद के दिन तक
और एक विश्राम दिन से दूसरे विश्राम दिन तक समस्त प्राणी मेरे सामने दण्डवत करने
को आया करेंगे.” (यशायाह ६६:२३)
नये चाँद का सन्दर्भ इंगित करता है कि सातवें दिन सब्त की
गणना के लिए कौन सा कैलेन्डर उपयोग किया जाना चाहिए: सृष्टि के समय स्थापित किया
गया चन्द्र-सौर्य कैलेन्डर. अन्तिम पीढ़ी उसके सब्त के दिन उपासना करके याहुवाह का
आदर करेगी. जबकि बाकि समस्त संसार उपासना के किये दूसरा दिन चुनेगा और उसे लागू भी
करेगा. प्रकाशितवाक्य प्रगट करता है कि अन्तिम लड़ाई में जो संसार के अन्त के समय
होगी राज्य की शक्ति के द्वारा लागू उपासना के भ्रामक दिन के साथ उपासना का नकली तंत्र एक कारण होगा.
“लोगो ने अजगर की पूजा की, क्योंकि उसने पशु को अपना अधिकार
दे दिया था, और यह कहकर पशु की पूजा की . . . वह उस पहले पशु का सारा अधिकार उसके
सामने काम में लाता था; और पृथ्वी और उसके रहने वालों से उस पशु जिसका प्राण घातक
घाव अच्छा हो गया था, पूजा कराता था. . . वह पृथ्वी के रहने वालों को भरमाता था .
. . उसे अधिकार दिया गया कि . . . जितने लोग उस पशु की मूर्ति की पूजा न करें,
उन्हें मरवा डाले.” (प्रकाशितवाक्य १३: ४,१२,१४-१५)
खतरों के बावजूद
अन्तिम पीढ़ी याहुवाह की व्यवस्था और सच्चे सब्त पर उसकी उपासना करने के लिए दृढ
रही.
“तेरे वंश के लोग बहुत काल के उजड़े हुए स्थानों को फिर बसाएँगे;
तू पीढ़ी पीढ़ी की पड़ी हुई नींव पर घर उठाएगा; तेरा नाम टूटे हुए बाड़े का सुधारक और
पंथो का ठीक करने वाला पड़ेगा. यदि तू विश्राम दिन को अशुद्ध न करे अर्थात् मेरे उस
पवित्र दिन में अपनी इच्छा पूरी करने का यत्न न करे, और विश्रामदिन को आनन्द का
दिन और याहुवाह का पवित्र किया हुआ दिन समझकर माने; यदि तू उसका सम्मान करके . .
.” ( यशायाह ५८:१२,१३)
जबकि बाकी संसार घोषणा करता है कि सब्त को दूर किया जाए, वे
जो सृष्टिकर्ता की उपासना उसके पवित्र सब्त पर करने के लिए उसके चन्द्र-सौर्य
कैलेन्डर की पुनर्स्थापना करते हुए लौट आते हैं स्वर्ग में बहुतायत से आदर पाएँगे.
धर्मशास्त्र घोषणा करता है:
“पवित्र लोगों का धीरज इसी में है, जो याहुवाह की आज्ञाओं
को मानते और याहुशुआ पर विश्वास रखते हैं.” (प्रकाशितवाक्य १४:१२)
सब्त का पालन याहुवाह के सभी विश्वासी लोगों के द्वारा
अनन्तकाल तक किया जाएगा. यह सर्वदा सृष्टिकर्ता और उद्धारकर्ता के प्रति उनकी
निष्ठा का चिन्ह ठहरेगा. आज ही चुनिए की आप उसकी उपासना और सेवा करेंगे जिसने
स्वर्ग और पृथ्वी, समुद्र और जो कुछ उसमें है बनाया.
याहुवाह की व्यवस्था
उसके व्यक्तित्व, उसके अन्तरतम विचारों और भावनाओं की सम्पूर्ण प्रतिलिपी है.
याहुवाह की व्यवस्था शाश्वत है. यह सर्वदा बनी रहेगी.
शैतान जानता है कि
पवित्र व्यवस्था स्वर्ग और पृथ्वी दोनों सरकार के लिए नियम है. वह यह भी जानता है
कि ऐसा कोई भी नहीं है जो व्यवस्था को तोड़ता है स्वर्ग में प्रवेश करने पाएगा.
इसलिए शैतान लोगो को यह विचार करने के लिये धोखा देता है कि अब व्यवस्था का पालन
करना आवश्यक नहीं है. शैतान सिखाता है कि व्यवस्था “अब बन्धनकारी नहीं है.” वह
दावा करता है कि व्यवस्था “क्रूस पर चढ़ा दी गई है.” यह न सिर्फ एक झूठ है परन्तु
यह धर्मशास्त्र का विरोध करना है!
क्योंकि मैं याहुवाह
हूँ, मैं बदलता नहीं. (देखिये मलाकी ३:६)
धर्मशास्त्र पवित्र
व्यवस्था के बारे में कहता है:
“इसलिए व्यवस्था
पवित्र है, और आज्ञा भी ठीक और अच्छी है.” (रोमियों ७:१२)
व्यवस्था बदली नहीं
जा सकती न ही दूर की जा सकती है क्योंकि यह पवित्र है. यह ठीक है!
यह अच्छी है – याहुवाह के समान.
याहुवाह की व्यवस्था खरी है,
वह प्राण को बहाल
कर देती है: याहुवाह के नियम विश्वास योग्य हैं,साधारण लोगो को बुद्धिमान बना देते
हैं;
याहुवाह के उपदेश सिद्ध हैं, हृदय को आनन्दित कर
देते हैं; याहुवाह की आज्ञा निर्मल है, वह आँखों में ज्योति ले आती है;
याहुवाह का भय
पवित्र है, वह अनन्तकाल तक स्थिर रहता है; याहुवाह के नियम सत्य और पूरी रीति
से धर्ममय हैं.
वे तो सोने से और
बहुत कुन्दन से भी बढकर मनोहर हैं; वे मधु से और टपकने वाले छत्ते से भी बढकर मधुर
हैं.
उन्हीं से तेरा दास
चिताया जाता है; उनके पालन करने से बड़ा ही प्रतिफल मिलता है. ( देखिये भजन
१९:७-११)
व्यवस्था पवित्र और
पूर्ण है. इसे बदलना या अलग कर देना इसका अनादर करना होगा की यह अपवित्र और अपूर्ण
है. यदि व्यवस्था बदली या अलग की जा सकती, इसका अर्थ यह होता कि व्यवस्था में कुछ
न कुछ गलत है. इस आशय का अर्थ यह होगा कि व्यवस्था देने वाले में कुछ गलत या अधर्म
है. बहुत से सच्चे मसीही रविवार के दिन उपासना करते हैं, यह विश्वास करते हुए की
व्यवस्था “क्रूस पर चढ़ा दी गई” जब याहुशुआ क्रूस पर चढाया गया. वास्तव में, क्रूस
ही सबसे बड़ा साक्ष्य है कि व्यवस्था शाश्वत है और “कभी अलग नहीं की जा सकती!”
धर्मशास्त्र घोषणा
करता है:
इसलिए कि सबने
पाप किया है और याहुवाह की महिमा से रहित हैं, (देखिये रोमियो ३:२३)
याहुवाह यह चाहता है
कि पाप की संरचना कैसे होती है इस बात के बारे में किसी को भी शंका न हो:
“पाप तो व्यवस्था का
विरोध है”. (१यहुन्ना ३:४)
बाइबल में व्यवस्था
तोड़ने के लिए क्या दण्ड है इसका स्पष्ट वर्णन है:
क्योंकि पाप की
मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु याहुवाह का वरदान हमारे प्रभु मसीह याहुशुआ में अनन्त
जीवन है (देखिये रोमियों ६:२३)
संसार को अपने
न्यायोचित दण्ड से बचाने के लिए याहुवाह ने अपने निज पुत्र को क्रूस पर बलिदान
होने के लिए दे दिया.
क्योंकि याहुवाह ने
जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर
विश्वास करे वह नष्ट न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए. (देखिये यहुन्ना ३:१६)
यहाँ साक्ष्य है कि पवित्र
व्यवस्था कभी बदली नहीं जा सकती, अलग नहीं की जा सकती, या “क्रूस पर नहीं चढाई” जा
सकती. यदि व्यवस्था का बदला जाना सम्भव होता तो याहुशुआ नहीं मरता! पिता ने आसानी
से व्यवस्था को बदल दिया होता ताकि व्यवस्था को तोड़ने का दण्ड मृत्यु न हो. यह
दावा करना कि “व्यवस्था क्रूस पर चढाई जा चुकी है”
उद्धार के अपरिमित मूल्य का अनादर करना है. इस कारण कि पवित्र, उचित और धार्मिक
व्यवस्था का बदला जाना सम्भव नहीं था, याहुवाह ने चाहा कि पापियों को उनके मृत्यु
के दण्ड से जिसके वे योग्य थे बचाने के लिए अपने निज पुत्र को बलिदान के लिए दे
दे. याहुशुआ हमारा एवजी है. वह, व्यवस्था देने वाले का पुत्र, व्यवस्था तोड़ने
वालों के लिए मरा, ताकि हम बचाए जाएँ.
 |
|
यदि व्यवस्था का बदला जाना सम्भव होता तो
याहुशुआ नहीं मरता! इस कारण कि पवित्र, उचित और धार्मिक व्यवस्था का बदला जाना
सम्भव नहीं था, याहुवाह ने चाहा कि पापियों को उनके मृत्यु के दण्ड से जिसके वे
योग्य थे बचाने के लिए अपने निज पुत्र को बलिदान के लिए दे दे.
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बाइबल परामर्श और
धार्मिकता के निर्देशों से भरी हुई है. “धार्मिक” का साधारण अर्थ “ठीक काम” होता
है. दुसरे शब्दों में वे जो बाइबल में धर्मी कहे जाते हैं वे हैं जो याहुवाह की
व्यवस्था का पालन करते हैं. धर्मशास्त्र की मूल्यवान वाचाएँ उनके लिए है जो
पवित्र व्यवस्था का पालन करते हैं: धर्मी
“क्योंकि तू धर्मी
को आशीष देगा; हे याहुवाह, तू उसको अपने अनुग्रहरूपी ढाल से घेरे रहेगा.” (भजन
५:१२)
“निश्चय धर्मियों के
लिए फल है” (भजन ५८:११)
“याहुवाह की ऑंखें
धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान भी उनकी दोहाई की ओर लगे रहते हैं. याहुवाह
बुराई करने वालों के विमुख रहता है, ताकि उनका स्मरण पृथ्वी पर से मिटा डाले.
धर्मी दोहाई देते हैं और याहुवाह सुनता है, और उनको सब विपत्तियों से छुड़ाता है.”
(भजन ३४:१५-१७)
याहुशुआ ने स्पष्ट
रूप से कहा कि कोई विद्रोही व्यवस्था को तोड़ने वाला स्वर्ग में प्रवेश नहीं करने
पाएगा. केवल वे जो धर्मी हैं, जो “अच्छे कार्यों” के द्वारा व्यवस्था का पालन करते
हैं अनन्त जीवन के उत्तराधिकारी होंगे.
“मनुष्य का पुत्र
अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्य में से सब ठोकर के कारणों को, और
कुकर्म करनेवालों, [व्यवस्था को तोड़ने वाले] को इकठ्ठा करेंगे और
उन्हें आग के कुण्ड में डालेंगे, जहाँ रोना और दांत पीसना होगा.
उस समय धर्मी [व्यवस्था का पालन करने वाले] अपने पिता के राज्य में सूर्य के
समान चमकेंगे.” (मत्ती १३:४१-४३)
सभी सांसारिक
सरकारों की भी व्यवस्था होती है. पवित्र व्यवस्था को अलग कर देना, यह दावा करना कि
“क्रूस पर चढ़ा दी गई” है और “अब बन्धनकारी नहीं” है, यह इससे अधिक कुछ नहीं कि
विद्रोह को स्वीकार करना और व्यवस्था को तोडना है. धर्मशास्त्र व्यवस्था को
तोड़ने की बराबरी दुष्टता से करता है और यह स्पष्ट है कि कोई “दुष्ट” स्वर्ग में
प्रवेश नहीं करने पाएगा. भविष्य का परदा मनुष्यों की आँखों पर से हटाकर आरेखित
करते हुए बाइबल बताती है कि स्वर्गीय “नगर में सूर्य और चाँद के उजियाले की
आवश्यकता नहीं, क्योंकि याहुवाह के तेज से उसमे उजियाला हो रहा है, और मेम्ना उसका
दीपक है. . .परन्तु उसमे कोई अपवित्र वस्तु, या घृणित काम करने वाला, या झूठ का
गढने वाला किसी रीति से प्रवेश न करेगा. पर केवल वे लोग जिनके नाम मेमने के
जीवन की पुस्तक में लिखे हैं.” (प्रकाशितवाक्य २१:२३,२७)
 |
|
पवित्र व्यवस्था को अलग कर देना, यह दावा करना कि “क्रूस पर
चढ़ा दी गई” है और “अब बन्धनकारी नहीं”
है, यह इससे अधिक कुछ नहीं कि विद्रोह को स्वीकार करना और व्यवस्था को तोडना है.
|
उद्धार के बहुमूल्य
योजना का उद्धेश्य यह था कि व्यवस्था के तोड़ने वालों के साथ मेल-मिलाप कराया जाए
और उन्हें व्यवस्था का पालन करने वाले बनाया जाए.
“क्योंकि पिता की
प्रसन्नता इसी में है कि याहुशुआ में सारी परिपूर्णता वास करे. और उसके क्रूस पर
बहे हुए लहू के द्वारा मेलमिलाप करके, सब वस्तुओं का उसी के द्वारा से
अपने साथ मेल कर ले, चाहे वे पृथ्वी पर की हों चाहे स्वर्ग में की.” (कुलुस्यियों
१:१९-२०)
स्वर्ग फिर से
अनश्वर व्यवस्था को तोड़ने वालों से नहीं भरा जाएगा. छुटकारे का मूल्य जो कि पवित्र
एवजी के द्वारा भुगतान किया गया है के द्वारा व्यवस्था तोड़ने वालों को साफ और
शुद्ध मस्तिष्क दिया जा सकता है. वे व्यवस्था का पालन करने वाले बन सकते हैं.
“याहुवाह कहता है कि
जो वाचा मैं उन दिनों के बाद उनसे बांधूंगा वह यह है कि मैं अपने नियमों को
उनके हृदय पर लिखूँगा और मैं उनके विवेक में डालूँगा. फिर वह यह कहता है, मैं उनके
पापों को और उनके अधर्म के कामों को फिर कभी स्मरण नहीं करूंगा.” (इब्रानियों
१०:१६,१७)
पिता और पुत्र का
यही अन्तिम आखरी लक्ष्य है: कि उनकी पवित्र व्यवस्था, उनके व्यक्तित्व का प्रतिरूप
एक बार फिर उनके मानव पुत्रों का चरित्र बन जावे. जब यह रूपांतरण पूरा हो जाएगा,
तब याहुशुआ ने जो प्रार्थना आखरी समय में अपने पीछे चलने वालों को गले लगा कर की
थी वह पूरी ही जाएगी.
“मैं केवल इन्हीं के
लिए बिनती नहीं करता, परन्तु उनके लिए भी जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास
करेंगे, कि वे सब एक हों; जैसा तू हे पिता मुझमें है, और मैं तुझमें हूँ, वैसे ही
वे भी हममें हों, जिससे संसार विश्वास करे की तू ही ने मुझे भेजा है वह महिमा जो
तू ने मुझे दी मैंने उन्हें दी है, की वे वैसे ही एक हों जैसे कि हम एक हैं, मैं
उनमें और तू मुझमे कि वे सिद्ध होकर एक हो जाए, और संसार जाने कि तू ही ने मुझे
भेजा, और जैसा तू ने मुझसे प्रेम रखा वैसा ही उनसे प्रेम रखा.” (यहुन्ना १७:२०-२३)
धर्मशास्त्र में
“महिमा”, “व्यक्तित्व” के लिए दूसरा शब्द है. व्यक्तित्व विचार और भावनाएँ हैं. जब
मूसा ने याहुवाह से प्रार्थना किया कि “मुझे अपना तेज दिखा”, शालीन उत्तर था:
मैं तेरे सम्मुख
होकर चलते हुए तुझे अपनी सारी भलाई दिखाऊंगा, और तेरे सम्मुख याहुवाह नाम का
प्रचार करूंगा. (देखिये निर्गमन ३३:१८,१९)
याहुवाह उसके सामने
होकर यों प्रचार करता हुआ चला याहुवाह,
याहुवाह ईश्वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और
सत्य, हजारों पीढियों तक निरंतर करुणा करनेवाला, अधर्म और अपराध और पाप का क्षमा
करने वाला है (देखिये निर्गमन ३४:६,७)
जब मुक्तिदाता की
“महिमा” (या व्यक्तित्व, उसके विचार और भावनाएँ) व्यवस्था के तोड़ने वालों को दी
जाती है वे व्यवस्था का पालन करने वाले बन जाते हैं. वे याहुशुआ के साथ एक हो जाते
हैं, वैसे ही जैसे वह पिता के साथ एक है. याहुवाह याहुशुआ में; याहुशुआ धार्मिकता
में और धर्मी उनमें. यह नियति उन सभी के लिए है जो पवित्र व्यवस्था का पालन करते
हैं, और शैतान के झूठ का इनकार करते हैं की वह “क्रूस पर चढ़ा दी गई”. व्यवस्था के
तोड़ने वाले कभी भी अनन्त राज्य के वारिस नहीं होंगे, परन्तु धर्मी, ठीक काम करके
व्यवस्था का पालन करने वाले सर्वदा बने रहेंगे, पिता और पुत्र की उपस्थिति में
आनन्द करते हुए जिनके द्वारा वे एक हैं क्योंकि प्रत्येक के अन्दर पवित्र, शुद्ध
और ठीक व्यवस्था है.
“बवन्डर निकल जाते
ही दुष्ट जन लोप हो जाता है, परन्तु धर्मी सदा लों स्थिर है. धर्मी सदा अटल रहेगा,
परन्तु दुष्ट पृथ्वी पर बसने न पाएँगे.” (नीतिवचन १०;२५,३०)
“तेरे लोग सब के सब धर्मी
होंगे; वे सर्वदा देश के अधिकारी रहेंगे.” (यशायाह ६०:२१)