World's Last Chance

At the heart of WLC is the true God and His Son, the true Christ — for we believe eternal life is not just our goal, but our everything.

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बलवा

हम जिद्दी विद्रोह और अवज्ञा के युग में रहते है।

पाप लूसिफ़ेर के पतन के बाद से दुनिया में प्रबल है। शैतान ने स्वर्गीय व्यवस्था को तोड़ा है और अब चाहता है कि सभी मनुष्य याहुवाह का भी कहा न माने। परन्तु क्या वह कामयाब होगा?

याहुवाह के लोगों को दिव्य व्यवस्था को तोड़ने का बढ़ावा देने के लिए शैतान की रणनीतियों की एक बड़ी भीड़ कार्यरत है।

सबसे प्रभावी तरीका है की हमारे विश्वासों के माध्यम से घुसपैठ कर, हमें यह राजी करने कि हम याहुवाह की व्यवस्था का पालन करने की अब जरूरत नहीं है।

बहुत से मसीही लोग याहुशूआ और उसके शब्दों के साथ उच्च सम्बंध रखने का दावा करते है; फिर भी, थोड़े ही जानते है कि आंख बंद करके उनके किए हुए कुछ विश्वास उन्हें शैतान के विद्रोह का समर्थन करने के लिए गुमराह कर रहे है।

“अनुग्रह और व्यवस्था” की अवधारणा को अक्सर गलत समझा गया है, फलस्वरूप, कई के लिए ठोकर का कारण बना है। एक गलत सूचना पर आधारित समझने, कि दिव्य अनुग्रह कैसे व्यवस्था से संबंधित है, दावा करने वाले बहुत से मसीहियों की यह मानने में अगुवाई की है कि उन्हे आज्ञाओं को पालन करने की अब जरूरत नहीं है।

अपने आप को इस त्रुटि से मुक्त करने के लिए, हमें यह अवश्य ही समझना चाहिए कि “अनुग्रह के अधीन” होने का धर्मशास्त्र में क्या मतलब है? क्या अनुग्रह का मतलब यह होता है कि हमें दस आज्ञाओं को पालन करने की जरूरत नहीं है?

सो हम क्या कहें? क्या हम पाप करते रहें, कि अनुग्रह बहुत हो? याहुवाह न करें… (देखिए रोमियो ६:१-२)

धर्मशास्त्र स्पष्ट है: हम अनुग्रह के कारण पाप करना जारी नहीं रखना चाहिए।

परंतु पाप क्या है?

“…पाप तो व्यवस्था का विरोध है।” (देखिए १ युहन्ना ३:४)

पाप = व्यवस्था का विरोध (१ युहन्ना ३:४)

अनुग्रह, हमें आज्ञाओं को तोड़ने के लिए स्वतंत्र नहीं करता, तो, परिभाषा के अनुसार याहुवाह की व्यवस्था का विरोध ही पाप है। यह सलाह देना कि अनुग्रह हमें दस आज्ञाओं को मानने से स्वतंत्र करता है, तो ये सुझाव देना होगा कि अनुग्रह पाप करने का लाइसेंस है! याहुवाह न करें।

बाईबल व्यवस्था के विरोध [पाप] के बारे में बहुत कुछ कहती है:

“क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है…” (रोमियो ६:२३)

“क्योंकि जो कोई सारी व्यवस्था का पालन करता है परन्तु एक ही बात में चूक जाए तो वह सब बातों में दोषी ठहरा।” (याकूब २:१०)

व्यवस्था को रखना स्पष्ट रूप से महत्वपूर्ण है। परंतु वही दूसरी तरफ, हम सिर्फ व्यवस्था को रखने के द्वारा सहेजा नहीं जा सकते :

“क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा…”(रोमियो ३:२०)

धर्मशास्त्र स्पष्ट है कि कोई भी व्यवस्था के कामों से नहीं बचाया जा सकता। तो कैसे हम को बचाया जा रहा है? कैसे व्यवस्था अनुग्रह से सम्बन्धित है? प्रकाशित वाक्य १४:१२ हमें बताता है कि संत वे होंगे जो आज्ञाओं को मानते और याहुशूआ पर विश्वास रखते हैं। यह केवल याहुवाह का अनुग्रह ही है कि वे व्यवस्था का पालन करने में सक्षम हैं।

“पवित्र लोगों का धीरज इसी में है जो याहुवाह की आज्ञाओं को मानते, और याहुशूआ पर विश्वास रखते हैं।” (देखिए प्रकाशित वाक्य १४:१२)

अनुग्रह के अधीन

आमतौर पर गलत समझा गया एक पद जिसका उपयोग अनुग्रह की व्याख्या करने के लिए:

“और तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के अधीन नहीं वरन अनुग्रह के अधीन हो।” (रोमियो ६:१४)

यह पद क्या कह रहा है? किसी भी निष्कर्ष का रेखाचित्र खींचने से पहले, अगले पद को पढ़ना जारी रखते है:

“तो क्या हुआ क्या हम इसलिये पाप करें, कि हम व्यवस्था के आधीन नहीं वरन अनुग्रह के आधीन हैं? कदापि नहीं।” (रोमियो ६:१५)

जैसा कि हमने पहले भी देखा, याहुवाह की व्यवस्था का विरोध करना ही पाप है (१ युहन्ना ३:४)।

तो यह पद, कह रहा है “क्या हमें याहुवाह की व्यवस्था का विरोध करना चाहिए क्योंकि हम अनुग्रह के अधीन है?” जवाब है: याहुवाह न करें।

जहां हमने पाप किया हमें दिखाने के लिए, व्यवस्था एक दर्पण के रूप में कार्य करती है।

बिना व्यवस्था के मैं पाप को नहीं पहचानता। (रोमियो ७:७)

व्यवस्था हमें दिखाता है कि हमने कहाँ पाप किया है ताकि हम याहुशूआ की ओर अगुवाई हो जाए। हम बचाए जाने के लिए आज्ञाओं का पालन नहीं करते। हम आज्ञाओं का पालन करते है क्योंकि हम बचाए गए है। आज्ञाओं का पालन करना हमारे उद्धार का फल है, न की जड़। हम दिव्य अनुग्रह के द्वारा बचाए गए है।

याहुशूआ ने आज्ञाओं को रखा है, और जब हम उसे जानते है, हम अधिक उसके जैसे बन जाएंगे।

“जो कोई यह कहता है, कि मैं उसे जान गया हूं, और उसकी आज्ञाओं को नहीं मानता, वह झूठा है; और उस में सत्य नहीं।” (१ युहन्ना २:४)

पवित्र वे है जो “याहुवाह की आज्ञाओं को मानते, और याहुशूआ पर विश्वास रखते हैं।” (प्रकाशित वाक्य १४:१२)

“जैसे देह आत्मा बिना मरी हुई है वैसा ही विश्वास भी कर्म बिना मरा हुआ है।” (याकूब २:२६)

आदमी कानून तोड़ने के लिए पुलिस द्वारा रोक दिया गयाव्यवस्था के अधीन? या अनुग्रह के अधीन? imageएक कार तेजी से जा रही थी और कानून तोड़ने की वजह से उसे रोक दिया गया। चालक जो तेजी से चला रहा था, तदनुसार दंडित किया जाना चाहिए था। परंतु दया की मांग करने पर, पुलिस ने उसे बस एक चेतावनी के साथ जाने दिया। चालक अब अनुग्रह के अधीन था। क्या अब चालक कानून को तोड़ने पर छूट जाएगा क्योंकि वह अनुग्रह के अधीन है? या उस पर प्रदान किए गए अनुग्रह का आभारी होकर अब वह और अधिक जिम्मेदारी से चलायेगा?

बाईबल

यह सब एक पाप के साथ शुरू हुआ। क्योंकि व्यवस्था को तोड़ा गया था, याहुशूआ ने हमें छुड़ाने के लिए मृत्यु की दंड का कीमत को चुना। इसलिए उसकी मृत्यु के बाद, व्यवस्था अब मान्य नहीं है? याहुशूआ ने तो खुद आज्ञाओं का पालन किया।

“यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे: जैसा कि मैं ने अपने पिता की आज्ञाओं को माना है, और उसके प्रेम में बना रहता हूं।” (युहन्ना १५:१०)

याहुशूआ के लिए हमारा प्यार कैसे प्रकट हुआ है?

“यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।” (युहन्ना १४:१५)

याहुशूआ के साथ हमारा संबंध कैसे प्रत्यक्ष बना है?

“जो कोई यह कहता है, कि मैं उसे जान गया हूं, और उसकी आज्ञाओं को नहीं मानता, वह झूठा है; और उस में सत्य नहीं।” (१ युहन्ना २:४)

उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैंने तुमको कभी नहीं जाना, हे कुकर्म [व्यवस्थाहीन] करने वालो, मेरे पास से चले जाओ। (मत्ती ७:२२-२३)

अगर हम सचमुच याहुवाह से प्रेम करते है, उसकी सभी आज्ञाओं का पालन करने के लिए उसके सक्षम बनाने वाले अनुग्रह को हम निरंतर खोजेंगे।

“और याहुवाह का प्रेम यह है, कि हम उस की आज्ञाओं को मानें; और उस की आज्ञाएं कठिन नहीं।” (१ युहन्ना ५:३)

सुखी परिवार

राजनयिक-प्रतिरक्षासन् १९७९ की बात थी। श्रीलंका में तैनात बर्मा के राजदूत को यकीन हो गया कि उसकी पत्नी का किसी के साथ अवैध संबंध चल रहा है। उन्होंने मामले को खुद के हाथों में लेने कि फैसला की, एक शाम, जब उसकी पत्नी देर से घर आई, उसे गोली मार दी। पड़ोसियों ने पुलिस को बताया कि घर के पिछवाड़े में अंतिम संस्कार किया जा रहा है। जब श्रीलंका की पुलिस वहाँ पहुँची, वे राजदूत को उनकी पत्नी का अंतिम संस्कार करते हुए देख तो सके, लेकिन राजदूत ने उन्हें अंदर कदम रखने से मना कर दिया था।

न्यूज़ीलैंड के एक बार उच्चायुक्त रह चुके गेराल्ड हेन्स्ले के अनुसार: “यह काफी परेशानी और समस्या का कारण था। राजदूत ने कहा कि यह बर्मी क्षेत्र था और इसलिए वे अंदर नहीं आ सकते।” 1

अपराध की गंभीरता के बावजूद, श्रीलंका सरकार राजदूत के खिलाफ आगे बढ़कर कार्यवाही करने में असमर्थ थी। फिर राजदूत को उनके देश वापस बुला लिया गया लेकिन तुंरत नहीं।2

एक हत्यारा खुले में घूम रहा था . . . क्योंकि उसके पास राजनयिक-प्रतिरक्षा थी।

कारागार से मुफ्त चले जानाराजनयिक-प्रतिरक्षा के गलत इस्तेमाल ने कई लोगों को इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाने का कारण बन गया था। यह न ही सही या उचित है कि एक व्यक्ति, राजदूत (स्थिति) होने के कारण, उसे किसी भी कानून को अवज्ञा करने की आज़ादी मिले।

और फिर भी . . .

लाखों मसीही एक ऐसी ही शिक्षा सिखाते हैं, जो वास्तव में उतना ही अन्याय और अनुचित है जितना कि कोई हत्यारा बड़ी ही आसानी से आजाद होकर बाहर घूम सकता है क्योंकि वह एक राजनयिक है। इस शिक्षा को “एक बार बचाया गया, हमेशा के लिए बचाया गया” या “अनंत सुरक्षा” कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, जब एक बार आप बच गए, तो आप हमेशा के लिए बचे रहेंगे। सुनने में अच्छा लगता है। हैं न? लेकिन इस धारणा का सावधानीपूर्वक और गहराई में अध्ययन करने से पता चलता है कि यह शिक्षा बाइबल आधारित नहीं है।

अनंत सुरक्षा के विचार उपस्थित करने वाले, इस विश्वास को उन कई वचनों पर आधार करते हैं, जो एक विश्वासी को उद्धारकर्ता में रहने मिलने वाली सुरक्षा के बारे में बताते हैं:

“मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं। और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा। मेरा पिता, जिस ने उन्हें मुझ को दिया है, सब से बड़ा है, और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता।” (यूहन्ना १०:२७-२९; HHBD)

(देखिए १ पतरस १:५; यूहन्ना ६:३९, यहूदा २४)

इन वचनों में, विश्वासियों को “भेड़” संदर्भित किया गया है जो चरवाहे की आवाज सुनते हैं और उसके पीछे-पीछे चलते हैं। “एक बार बचाये गए, हमेशा बचाये गए” सिखाने के बजाय, ये वचन वादा करते हैं कि याहुवाह को समर्पित होकर, दिव्य इच्छा के अधीन रहकर जीने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह की आत्मिक हानि नहीं होगी।

हालांकि, भेड़ें भटकने के लिए जानी जाती हैं। “हम तो सब के सब भेड़ों की नाईं भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया. . .” (यशायाह ५३:६; HHBD) अगर कोई व्यक्ति याहुवाह को अपनी इच्छा का समर्पण करना रोक दिया और जानबूझकर पाप करने लगा, तो वह खो जाएगा – भले ही उसने पहले ही उद्धार का उपहार ग्रहण कर लिया हो।

याहुवाह कभी भी मानव-इच्छा को जोर नहीं देता। इसी वजह से पवित्र शास्त्र चेतावनियों से भरा हुआ है, कि उन लोगों के साथ क्या होगा, जिन्होंने एक बार उद्धार स्वीकार किया, और भटक गए। “खोई हुई भेड़ का दृष्टांत” पिता और उद्धारकर्ता की खोई और भटकी हुई आत्माओं के लिए दयामय प्रेम का खुलासा करता है। लेकिन तब भी, किसी आत्मा को वापस जाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता सभी को आश्वासित है। अगर हृदय हठपूर्वक पापों से चिपक जाता है, तो दया की लहरें पीछे चली जाएगी और कभी न वापस आएगी।

ठहनियों को काटनाएक दाखलता और उसकी डालियों के सादृश्य का उपयोग करते हुए, याहुशुआ उन सभी का भाग्य समझाते हैं जो उसमें बने नहीं रहते: यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली के समान फेंक दिया जाता, और सूख जाता है; और लोग उन्हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं।” (यूहन्ना १५:६; HINDI-BSI)

डाली घास नहीं है जो कभी भी दाखलता के साथ जुड़ा नहीं थी। कोई भी डाली तभी बढ़ और बनी रह सकती है यदि वह दाखलता (पौधा) से जुड़ी हुई होती है। उद्धारकर्ता के दृष्टांत में डालियाँ उन लोगों को संदर्भित करता है, जो एक समय में, उसके साथ निकटता से जुड़े हुए थे, और बढ़ने और बने रहने के लिए आत्मिक पोषण प्राप्त कर रहे थे! परन्तु, दैवीय रूप से उन्हें दी गई स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग करते हुए, वे अपने जीवन के स्रोत से अलग हो गए। वे बेकार हो गए और आखिरकार उन्हें फेंक दिया गया।

“अनंत सुरक्षा” सिखाना तो दूर की बात है, पवित्र शास्त्र सटीकता से इसके विपरीत सिखाता है: यह संभव है कि एक समय पर उद्धार को स्वीकार कर लिया जाए और बाद की तारीख में, स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग करते हुए, याहुवाह के खिलाफ विद्रोह के जीवन में वापस लौट जाएं। दौड़ की दृष्टान्त का उपयोग करते हुए, प्रेरित पौलुस ने उन बलिदानों और सावधानीपूर्वक तैयारियों पर प्रकाश डालता है जो पहलवान को पुरस्कार जीतने के लिए तैयार करती है। वह इस दृष्टान्त को यह स्वीकार करते हुए समाप्त करता है कि, वह भी अपना उद्धार खो सकता है:

क्या तुम नहीं जानते कि दौड़ में तो दौड़ते सब ही हैं, परन्तु इनाम एक ही ले जाता है? तुम वैसे ही दौड़ो कि जीतो। हर एक पहलवान सब प्रकार का संयम करता है; वे तो एक मुरझानेवाले मुकुट को पाने के लिये यह सब करते हैं, परन्तु हम तो उस मुकुट के लिये करते हैं जो मुरझाने का नहीं। इसलिये मैं तो इसी रीति से दौड़ता हूँ, परन्तु लक्ष्यहीन नहीं; मैं भी इसी रीति से मुक्‍कों से लड़ता हूँ, परन्तु उस के समान नहीं जो हवा पीटता हुआ लड़ता है। परन्तु मैं अपनी देह को मारता कूटता और वश में लाता हूँ, ऐसा न हो कि औरों को प्रचार करके मैं आप ही किसी रीति से निकम्मा ठहरूँ। (१ कुरिन्थियों ९:२४-२७; HINDI-BSI)

मार्ग में भागनापौलुस जानता था कि उसका उद्धार्कता के साथ बचाए गए हुए संबंध में रहने पर भी, यह बात, उसकी चुनने कि स्वतंत्र इच्छा को नहीं चुराता है। उसके द्वारा किए गए चुनाव (निर्णायों) से वह अब भी, अनंत जीवन खो सकता है। क्रूस पर उद्धारकर्ता की मृत्यु पिछले किए गए पापों के लिए “राजनयिक प्रतिरक्षा” प्रदान करती हैं। यह जानबूझकर किए गए वर्तमान पापों के लिए उत्तरदायी (जवाबदेही) होने कि जिम्मेदारी को नहीं निकालता। इस प्रकार, पौलुस को एहसास हुआ कि, दूसरों को उद्धार के रास्ता में अगुवाई करने के बावजूद, उसके अपने निज़ी चुनाव (निर्णयों) के द्वारा वह “अयोग्य” हो सकता है। यह शब्द “अयोग्य”, का अनुवाद “एडोकोमॉस” (#96) से किया गया, जिसका अर्थ है: “अस्वीकृत, यानि ठुकराया हुआ; जो योग्य नहीं है, निकम्मा, . . . , ठुकराया हुआ।”

ये वचन सही संदर्भ के उदाहरण प्रदान करते हैं कि अयोग्य या निकम्मे हृदय होने का अर्थ क्या है। (देखिए तीतुस १: १०-१६ ; २ तीमुथियस ३:८; १ कुरुन्थियों १३: ५:७)

शायद इस शब्द का सबसे स्पष्ट उपयोग, और जो सीधे तौर पर “एक बार बचाया गया, हमेशा बचाया गया” का खंडन करता है, वह रोमियों १: १८-३२ में पाया जाता है। यहाँ पौलुस विशेष रूप से कहता है कि, हालांकि ये व्यर्थ विचार करने वाले निकम्मे (वचन २१) याहुवाह को जानने पर भी, वे पाप करने में अड़े हुए हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि ये मूर्तिपूजक थे जो सृष्टिकर्ता को नहीं जानते थे। लेकिन, याहुवाह को जानते हुए भी, वचन २८ में कहा गया है, कि वे उन्हें पहचानना (स्वीकार करना) नहीं चाहते थे: “जब उन्होंने परमेश्‍वर को पहिचानना न चाहा, तो परमेश्‍वर ने भी उन्हें उनके निकम्मे मन पर छोड़ दिया कि वे अनुचित काम करें।” (रोमियों १:२८; HINDI-BSI)

ध्यान दें कि याहुवाह ने “उन्हें एक निकम्मे मन पर छोड़ दिया था।” यहीं याहुवाह के द्वारा दिए गए उद्धार के सत्य को प्रस्तुत किया गया है: “प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के विषय में देर नहीं करता, जैसी देर कुछ लोग समझते हैं; पर तुम्हारे विषय में धीरज धरता है, और नहीं चाहता कि कोई नष्‍ट हो, वरन् यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले।” (२ पतरस ३:९; HINDI-BSI) लेकिन, जितना वह सभी को पश्चाताप को लाने की इच्छा रखता है ताकि सभी को बचाया जा सके, उतना ही उन्हें उनके खुद के लिए चुनने का व्यक्तिगत अधिकार को वह कभी नहीं हटाएगा। वह उन लोगों को जाने और उन्हें अपनी इच्छाओं का पालन करने के लिए छोड़ देगा जो याहुवाह ऐलोहीम के साथ एक रिश्ता नहीं रखना चाहते।

उसी तरह प्रेरित पतरस भी यह सिखाता है:

जब वे प्रभु और उद्धारकर्ता याहुशुआ, अभिशिक्त की पहचान के द्वारा संसार की नाना प्रकार की अशुद्धता से बच निकले, और फिर उनमें फँसकर हार गए, तो उनकी पिछली दशा पहली से भी बुरी हो गई है।

क्योंकि धर्म के मार्ग का न जानना ही उनके लिये इससे भला होता कि उसे जानकर, उस पवित्र आज्ञा से फिर जाते जो उन्हें सौंपी गई थी।

उन पर यह कहावत ठीक बैठती है, कि कुत्ता अपनी छाँट की ओर और नहलाई हुई सूअरनी कीचड़ में लोटने के लिये फिर चली जाती है। (२ पतरस २:२०-२२; HINDI-BSI)

कुत्ता अपनी छाँट को चाटता है यह एक बाइबल आधारित सिद्धांत है कि: “दो या तीन गवाहों के मुँह से हर एक बात ठहराई जाएगी।” (२ कुरिन्थियों १३:१; HINDI-BSI) इस प्रकार, अन्य जातियों के लिए प्रेरित, पौलुस और यहूदियों के लिए प्रेरित, पतरस, दोनों सहमति व्यक्त करते हैं, कि कोई भी व्यक्ति उद्धार का उपहार स्वीकार करने के बावजूद, अपने स्वतंत्र इच्छा का उपयोग करके वह अपना उद्धार को खो सकता है।

“अंनत सुरक्षा” की त्रुटि से चिपके रहने का खतरा यह है कि, राजनयिक प्रतिरक्षा के तरह, यह तर्कसंगत या कोई बहाने के तरह उपयोग किया जा सकता है जिन पापों को हठीला हृदय आत्मसमर्पण नहीं करना चाहता है। उद्धार एक मुफ्त उपहार है, लेकिन यह दैनिक आधार पर याहुवाह को आत्मसमर्पण करने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी को नहीं निकालता। “एक बार बचाया गया, हमेशा बचाया गया” एक प्रचलित त्रुटि है क्योंकि यह वास्तव में, प्रभावी रूप से, एक व्यक्ति द्वारा भविश्य में करने वाले कार्यों और लेने वाले निर्णयों के परिणाम से छूठ देती है भले ही कितने गंभीर रूप से, या लगातार, दिव्य व्यवस्था को तोड दिया हो। यह एक प्रकार की दिव्य “राजनयिक प्रतिरक्षा” है, जिसे वे मानते हैं, कि, वे जो कुछ भी करें, तो ढ़प जाता है क्योंकि वे अब बचाये जा चुके हैं।

यह अनुमान लगाना अत्यन्त खतरनाक है। पवित्र आत्मा का काम हैं: “संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा।” (यूहन्ना १६:८; HINDI-BSI)। पवित्र आत्मा किसी विशेष पाप को दूर करने के लिए एक व्यक्ति के हृदय पर प्रेरणा डालता होगा, लेकिन जब वह व्यक्ति “एक बार बचाया गया, हमेशा बचाया गया” सिद्धांत में विश्वास करता है तो ऐसे प्रेरणायों को “संदेह” समझकर नकार दिया जाता है। यह बेहद खतरनाक है क्योंकि पवित्र आत्मा को नकारना एक ऐसा पाप है जो क्षमा के योग्य नहीं है। जब पवित्र आत्मा की प्रेरणाओं को लगातार खारिज कर दिया जाता है, तो स्वर्ग और कुछ नहीं कर सकता।

पवित्रशास्त्र उन सभी के भाग्य के बारे में स्पष्ट है जो उद्धारकर्ता का अनुसरण करने से पीछे हट जाते हैं:

क्योंकि जिन्होंने एक बार ज्योति पाई है, और जो स्वर्गीय वरदान का स्वाद चख चुके हैं और पवित्र आत्मा के भागी हो गए हैं, और याहुवाह के उत्तम वचन का और आने वाले युग की सामर्थ्य का स्वाद चख चुके हैं, यदि वे भटक जाएँ तो उन्हें मन फिराव के लिये फिर नया बनाना अनहोना है; क्योंकि वे याहुवाह के पुत्र को अपने लिए फिर क्रूस पर चढ़ाते हैं और प्रकट में उस पर कलंक लगाते हैं। (इब्रानियों ६:४-६; HINDI-BSI)

कुछ लोग यह वाद-विवाद करेंगे कि, यदि कोई व्यक्ति भटक जाता है, तो वह शुरुआत से ही नहीं बचा था, लेकिन यह पवित्रशास्त्र के वचन से सुसंगत नहीं है। पौलुस स्पष्ट रूप से कहता है “एक बार ज्योति पाई“। यदि कोई व्यक्ति दिव्य अनुग्रह से अपनी पीठ मोड़ लेता है, तो दिव्य प्रेम उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध रहने के लिए कभी मजबूर नहीं करेगा। क्योंकि सच्चाई की पहचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं।” (इब्रानियों १०:२६; HINDI-BSI)

शायद “एक बार बचाया गया, हमेशा बचाया गया” के सिद्धांत के बारे में सबसे बुरी चीज यह हो सकता है, कि, यह याहुवाह के चरित्र के बारे में क्या सिखाता है।“क्योंकि याहुवाह ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नष्ट न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। याहुवाह ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए। (यूहन्ना ३:१६-१७; HINDI-BSI) विरासत में मिली पाप करने की स्वभाव, आदम के हर पुत्र और पुत्री से उस योग्यता को चुरा लिया, जहाँ वे खुद के लिए चुन सकें कि वे किसकी सेवा करेंगे: याहुवाह की या शैतान की। याहुशुआ का बलिदान यह आश्वासित नहीं किया की सभी बचाए जाएँगे। आदम के चुनाव के द्वारा अनंत जीवन को खोने के बजाय यह केवल अपने लिए चुनने का अधिकार को बहाल किया।

याहुवाह, जिन्होंने स्वतंत्र व्यक्तिगत चुनाव के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए इतना बड़ा त्याग दिया, कभी भी उस अधिकार को नहीं हटायेगा जैसे ही कोई व्यक्ति जो मसीह में खुद को उद्धारकर्ता के साथ बचाये जाने के संबंध में बांधा हुआ हो। पाप इच्छा का गुलाम बनाता है; और छुटकारा इसे याहुवाह के साथ फिर से बहाल करता है। लेकिन उस समय कोई भी इच्छा-रहित मन का गुलाम नहीं बनता। सभी के पास व्यक्तिगत चुनाव का अधिकार है और याहुवाह कभी भी उस अधिकार को अपने प्राणियों पर से नहीं हटायेगा।

बाइबल सिखाता है कि विश्वासी तभी सुरक्षित रहते हैं जब वे याहुवाह के प्रति वफादार रहते हैं। लेकिन अगर कोई याहुशुआ के हाथ को छोड देना चाहता है, तो फिर उसके लिए कोई आश्वासन नहीं है। “क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है” (रोमियो ६:२३; HHBD) उनके लिए भी जिन्होंने एक बार उद्धार स्वीकार किया था।

सारे त्रुटियाँ जीवन और प्रेम के स्रोत से अलग करता है। यह तथ्य कि याहुवाह ने स्वतंत्र इच्छा को सुनिश्चित करने के लिए अपने पुत्र का बलिदान कर दिया और वह सभी को उस स्वतंत्र-इच्छा को बनाए रखने की अनुमति देता है, इतना गहरा प्रेम प्रदर्शित करता है, इतना दूर कि मानव मन उसे पूरी तरह से समझ नहीं सकता। “एक बार बचाया गया, हमेशा बचाया गया” की त्रुटि से बाहर निकलें। आपको सभी नुकसानों से सुरक्षित रखने वाले पिता के पास आएँ। याहुवाह कभी भी आपके व्यक्तित्व, आपके आत्म-हनन, आपकी स्वतंत्र इच्छा का उल्लंघन नहीं करेगा, लेकिन जब आप उनको अपनी इच्छा की आत्मसमर्पण करने के लिए चुनते हैं, तो वह आपको बचाए रखेगा।


धर्मग्रन्थ के कुछ
भाग दूसरे अंश से प्रतिकूल प्रगट हो सकते हैं. जब बाइबल के छात्र इसे पाते है, तब
वे यह मान लेते हैं कि बाइबल विश्वास करने के योग्य नहीं है. इस मतभिन्नता का
विश्लेषण करने के बदले वे बाइबल को अस्वीकार कर देते हैं.

बाइबल के प्रत्येक
छात्र को यह स्मरण रखना चाहिए कि:

सत्य एकसा है

सत्य कभी अपने-आप का खण्डन नहीं करता.

जब बाइबल का एक
सन्दर्भ बाइबल के दूसरे पद से भिन्न नजर आए, तब यह स्वर्गीय आमंत्रण है कि और अधिक
अध्ययन किया जाए. विषय से सम्बन्धित सभी तथ्य और सिद्धान्त को अध्ययन के लिए
प्रस्तुत करना चाहिए. निष्कर्ष जो साक्ष्य के महत्व के प्रतिकूल या खण्डन में न हो
वही सही तालमेल होगा. इसके अतिरिक्त Bible Studyअध्ययन हमेशा प्रगट खण्डन का विश्लेषण करता है क्योंकि सत्य कभी
अपने आप का खण्डन नहीं करता. एक अंश जिसने
बहुत से लोगों को भ्रमित कर दिया वह रोमियों १४:५-६ में पाया जाता है.

“कोई तो एक दिन को
दूसरे से बढ़कर मानता है, और कोई सब दिनों को एक समान मानता है. हर एक अपने ही मन
में निश्चय कर ले. जो किसी दिन को मानता है, वह याहुवह के लिए मानता है. जो खाता है, वह याहुवह के लिए खाता है, क्योंकि वह
याहुवह का धन्यवाद करता है, और जो नहीं खाता, वह याहुवह के लिए नहीं खाता और
याहुवह का धन्यवाद करता है.” (देखिए रोमियों १४:५-६)

यह वचन “हर एक अपने
मन में निश्चय कर ले” का उपयोग यह सिद्ध करने के लिए किया जाता है कि सब यह चुनाव
करने के लिए स्वतंत्र है कि वे किसी दिन , जो भी हो, सृष्टिकर्ता की उपासना करें.
लोग प्रत्येक दिन उपासना करने का दावा करते हैं और उपासना के लिए विशिष्ट सब्त का
दिन न होने के समर्थन में बाइबल के रोमियों १४ का भी उपयोग करते हैं. यह विश्वास
इस कल्पना पर आधारित है कि पौलुस उद्धत अंश में सब्त और पर्बों पर बोल रहा है.
तौभी सन्दर्भ की और पौलुस के द्वारा लिखे गए पत्रों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने
पर इस विचार की त्रुटि प्रगट होती है. पौलुस ने हमेशा
पर्बों और सातवें दिन सब्त का पालन किया
और अपने धर्मान्तरित लोगों को भी यही करना सिखाया. पौलुस ने कभी यह नहीं सिखाया की
पवित्र व्यवस्था अब बन्धनकारी नहीं है. पूर्व में रोमियों में ही पौलुस ने यह
अंगीकार किया है कि “इसलिए व्यवस्था पवित्र है, और आज्ञा भी ठीक और अच्छी है.”
(रोमियों ७:१२) पौलुस ने हमेशा विश्वास के द्वारा
धार्मिकता को सम्मान के साथ संतुलित किया कि व्यवस्था अभी भी बन्धनकारी
है और इसका पालन किया जाना चाहिए.

तो क्या हुआ? क्या
हम इसलिए पाप करें कि हम व्यवस्था के अधीन नहीं वरन अनुग्रह के अधीन हैं? कदापि
नहीं!
(देखिए रोमियों ६:१५)

रोमियों १४:५ और ६
का सन्दर्भ यह स्पष्ट करता है कि पौलुस का सभी दिनों का एकसा सम्मान करने से क्या
अर्थ था. वह मूर्तिपूजकों के व्यवहार से सम्बन्धित था. रोमियों १४ का प्रारम्भ
रोमी विश्वासियों को यह निर्देश देते हुए होता है, कि वे नये धर्मान्तरित लोगों को
जो विश्वास में कमजोर थे समर्थन दें और
उन्हें ऐसे बिन्दुओ की चर्चा में न उलझाएँ जो उनके नये विश्वास को हिलाकर रख दे.

“जो विश्वास में
निर्बल है, उसे अपनी संगति में ले लो, परन्तु उसकी शंकाओं पर विवाद करने के लिए
नहीं. एक को विश्वास है कि सब कुछ खाना उचित है, परन्तु जो विश्वास में निर्बल है
वह साग-पात ही खाता है. खानेवाला न खानेवाले को तुच्छ न जाने, और न खानेवाला
खानेवाले पर दोष न लगाए; क्योंकि याहुवह ने उसे ग्रहण किया है. तू कौन है जो दूसरे
के सेवक पर दोष लगता है? उसका स्थिर रहना और गिर जाना उसके स्वामी ही से सम्बन्ध
रखता है; वरन वह स्थिर ही कर दिया जाएगा,
क्योंकि याहुवह उसे स्थिर रख सकता है. कोई तो एक दिन को दूसरे से बढ़कर मानता है,
और कोई सब दिनों को एक समान मानता है. हर एक अपने ही मन में निश्चय कर ले. जो किसी
दिन को मानता है, वह याहुवह के लिए मानता है. जो खाता है, वह याहुवह के लिए खाता है, क्योंकि वह
याहुवह का धन्यवाद करता है, और जो नहीं खाता, वह याहुवह के लिए नहीं खाता और
याहुवह का धन्यवाद करता है. क्योंकि हममें से न तो कोई अपने लिए जीता है और न कोई
अपने लिए मरता है.” (रोमियों १४:१-७)

ये नये धर्मान्तरित,
मूर्तिपूजकों से निकल कर आये थे. इन लोगों की ऐसी प्रकृति थी कि उनमें अभी तक उनके
पुराने मूर्तियों की शक्ति का भय व्याप्त था. बहुत से अभी तक अपने पुराने
अन्धविश्वास से प्रभावित थे. क्योंकि शहर में बहुत सारा मांस मूर्तियों को चढ़ाया
जाता था, बहुत से नये धर्मान्तरित लोगों को मांस खाने से दूर रखा जाता था और इसके
बदले उन्हें फल, अन्न और सब्जी खाने के लिए चुनाव करना होता था. पौलुस यह अच्छी
तरह जानता था कि मूर्तियों की शक्ति शैतानों से निकल कर आती है और याहुवह की शक्ति
अधिक शक्तिशाली है. पौलुस को मूर्तियों पर चढ़ाया हुआ मांस खाने में कोई समस्या
नहीं थी क्योंकि वह जानता था कि मूर्ति कोई ईश्वर है ही नहीं. मूर्ति और उनको
बलिदान कर चढ़ाया हुआ भोजन पौलुस के लिए कोई समस्या नहीं थी क्योंकि वह पहले इस
चढावा प्रथा का एक हिस्सेदार था. पौलुस एक विश्वास योद्धा और भेड़ो का उदार चरवाहा
था. वह जानता था कि उसका विश्वास मूर्तियों का चढ़ावा खाने से नहीं हिलेगा, लेकिन
दूसरों में यह ज्ञान नहीं है.

headless idols in Corinth“पर सबको यह ज्ञान
नहीं, परन्तु कुछ तो अब तक मूर्ति को कुछ समझने के कारण मूर्तियों के सामने बलि की
हुई वस्तुओं को कुछ समझकर खाते हैं, और उनका विवेक निर्बल होने के कारण अशुद्ध हो
जाता है. भोजन हमे याहुवह के निकट नहीं पहुँचाता. यदि हम न खाएँ तो हमारी कुछ हानि
नहीं, और

यदि खाएँ तो कुछ लाभ
नहीं.” (१कुरन्थियों ७:७-८)

पौलुस ने यह निश्चय
कर रखा था कि ऐसा कोई कार्य कभी न करे जिससे दूसरे के विश्वास कमजोर हो.

उसने अपना निर्देश
जारी रखा:

“परन्तु सावधान! ऐसा
न हो कि तुम्हारी यह स्वतन्त्रता कहीं निर्बलों के लिए ठोकर का कारण हो जाए.
क्योंकि यदि कोई तुझ ज्ञानी को मूर्ति के मन्दिर में भोजन करते देखे और वह निर्बल
जन हो, तो क्या उसके विवेक को मूर्ति के सामने बलि कि हुई वस्तु को खाने का साहस न
हो जाएगा.इस रीति से तेरे ज्ञान के कारण वह निर्बल भाई जिसके लिए याहुशुआ मरा,
नष्ट हो जाएगा. इस प्रकार भाईयों के विरुद्ध अपराध करने से और उनके निर्बल विवेक
को चोट पहुँचने से, तुम मसीह के विरुद्ध अपराध करते हो. इस कारण यदि भोजन मेरे भाई
को ठोकर खिलाए, तो मैं भी किसी रीति से मांस न खाऊंगा, न हो कि मैं अपने भाई के
लिए ठोकर का कारण बनूँ.” (१कुर्न्थियो ८:९-१३)

कुछ नये धर्मान्तरित
लोग किसी दिन को अपने पुराने मूर्तिपूजक विश्वास के अनुसार किसी अन्य दिन से अधिक
आदर का मानते थे. मूर्तिपूजक अक्सर आंशिक उपवास करते थे और कुछ विशेष दिनों में
कुछ भोजन वस्तुओं से परहेज करते थे. यह रोमन केथोलिक लोगों के समान है जो शुक्रवार
को मछली खाते हैं परन्तु अन्य मांस नहीं खाते. कुछ नये धर्मान्तरित मूर्तियों को
बलिदान किये गए भोजन को खाने में डरते थे परन्तु वहीं दूसरे लोग अब भी ईश्वर के
विभिन्न उपवास दिनों का पालन कर रहे थे. कुछ लोग किसी एक दिन को या दूसरे उपवास
दिन को बिना कोई विशिष्ट आदर दिए, सभी दिन को समान मानते थे. यही वह विषय था जिसके
बारे में पौलुस रोमियों १४ में कह रहा था. वह सातवें दिन सब्त या वार्षिक पर्ब दिनों के सम्बन्ध में बिलकुल ही नहीं
कह रहा था!

बहुत से लोगों
द्वारा यह वाक्यांश “हर एक अपने मन में निश्चय कर ले” (रोमियों १४:५) को गलत समझा
गया. यह किसी को भी व्यवस्था को तोड़ने और उपासना के लिए स्वयं ही कोई भी दिन का
चुनाव करने की इजाजत नहीं देता. इसके विपरीत पौलुस इस सन्दर्भ में कह रहा है कि
प्रत्येक व्यक्तिगत रूप से अभिशस्त हो जाए कि क्या ठीक है ताकि वह व्यवस्था का
पालन कर सके.

वाक्यांश “fully convinced” or “fully persuaded” आता है plerophoreo
से इस
ग्रीक शब्द का अर्थ:

“To
carry out fully (in evidence),i.e. completely
assure (or convince), entirely accomplish …इस शब्द का अर्थ ‘to bring in full
measure, to fullfil’, … in Roman 14:5 it is said of the apprehension
[understanding] of the will of …[Yahuwah ]”(#4135, Strongs Expanded Dictionary
of the Bible words, p 1318)

पौलुस ने यह दावा
कभी नहीं किया कि व्यवस्था का पालन न किया जाए. अपेक्षाकृत वह रोमियों से कह रहा
है कि प्रत्येक को कर्मठतापूर्वक याहुवह की इच्छा की पूर्ण समझ के लिए प्रार्थना
करना चाहिए. यदि रोमी वास्तव में अपने अपने मस्तिष्क में “पूर्णतःविश्वास “ में
होते तब कुछ नये धर्मान्तरित जो अभी तक मूर्तिपूजक अन्धविश्वास से डरते और
मूर्तिपूजक उपवासों को मानते है, को कोई समस्या नहीं होती पौलुस का प्रबोधन यह था
कि सभी इन “भोले-भालों को विश्वास” में सुरक्षित रखें और उनके लिए ठोकर का अवरोध न
बनें. इसके बदले जो विश्वास में नये हैं, उनकी यह जिम्मेदारी है कि वे व्यवस्था और
याहुवह की इच्छा का अध्ययन करें ताकि वे प्रत्येक पवित्र इच्छा को समझें और उसकी
सामंजस्यता में रहें.

याहुवह हमारे जीवन
की छोटी से छोटी बात के लिए चिंतित है. फिर भी वह चाहता है कि हम यह समझें कि
कार्य, भोजन या उपवास के द्वारा हम बचाए नहीं जा सकते. उसकी दिलचस्पी हृदय की
अभिप्रेरणा से है जो कार्य के लिए प्रेरित करती है. पौलुस यह समझता है कि सिर्फ
प्रेम के द्वारा की गई सेवा ही याहुवह को ग्रहण योग्य है. उसने रोमी विश्वासियों
को फटकार दी कि वे एक दूसरे को कार्य, उपवास करने या न करने के बारे में परखना छोड़
दें.

“तू अपने भाई पर
क्यों दोष लगता है ? या, तू फिर क्यों अपने भाई को तुच्छ जानता है ? हम सब के सब
याहुवह के न्याय सिंहासन के सामने खड़े होंगे. क्योंकि लिखा है.

‘याहुवह कहता है, मेरे जीवन
कि सौगन्ध कि हर

एक घुटना मेरे सामने
टिकेगा

और हर एक जीभ याहुवह को
अंगीकार करेगी.’

इसलिए हममें से हर
एक याहुवह को अपना-अपना लेखा देगा. (देखिए रोमियों १४:१०-१२)

पौलुस के सम्पूर्ण सन्देश का मुख्य विषय यह है
कि पिता के प्रेम के कारण विश्वास के साथ व्यवस्था का पालन किया जाए. पौलुस ने
रोमियों को दूसरों को परखने के सम्बन्ध में चेतावनी दी है क्योंकि हम सब भी याहुवह
के सामने परखे जाएंगे.

“प्रेम पड़ोसी की
कुछ बुराई नहीं करता, इसलिए प्रेम रखना व्यवस्था को पूरा करना है”. (रोमियों
१३:१०)

पौलुस का सन्देश आज
भी वैसा ही लागू होता जैसा पहले लिखा गया था. प्रत्येक को उन लोगों की जो विश्वास
में नये हैं सुरक्षा करना चाहिए न कि उन्हें परखने और उनके लिए अवरोध उत्पन्न करने
वाले. प्रत्येक को ज्ञान, अध्ययन और याहुवह कि इच्छा की समझ और उसके सामंजस्यता
में अपना जीवन व्यतीत करने के लिए वचनबद्ध होना चाहिए. सभी विश्वासियों को
व्यवस्था का पालन करना चाहिए क्योंकि वे व्यवस्था के देने वाले से प्रेम रखते है.

While WLC no longer believes that the annual feast days are binding upon believers today, we humbly encourage all to set time aside to commemorate them with solemnity and joy, and to learn from Yahuwah’s instructions concerning their observance under the Old Covenant. Doing so will surely be a blessing to you and your home, as you study the wonderful types and shadows that point to the exaltation of Messiah Yahushua as the King of Kings, the Lord of Lords, the conquering lion of the tribe of Judah, and the Lamb of Yahuwah that takes away the sins of the world.


निकम्मी आदि-शिक्षा की बातों पर वापस मत लौटना!

बहुत से लोग आज गलातियों की पुस्तक से भ्रमित हो गये है। रविवार के रखनेवाले दावा करते हैं कि सब्बात क्रूस पर चढ़ा दिया गया था। शनिवार के रखनेवाले उन्हीं पदों का उपयोग यह दावा करने के लिए करते हैं कि याहुवाह के पर्व अब और बाध्यकारी नहीं हैं। सभी का दावा है कि गलातियों के अध्याय ४ में उल्लेखित “निर्बल और निकम्मी आदि-शिक्षा की बातें”, इस्राएलियों की व्यवस्था से संदर्भित है जो आज के मसीहियों पर अब और बाध्यकारी नहीं। दो लोग बाइबल पढ़ रहे हैंशामिल मुद्दों की एक समझ पूरी तरह से कुछ अलग ही प्रकट करता है। पौलुस ने मुख्य रूप से अन्य-जाति श्रोतागण के लिए लिखा था और स्वर्ग ने उसकी सेवकाई को अति आशीषित भी किया।

“जैसा खतना किए हुए [इस्राएली] लोगों के लिये सुसमाचार का काम पतरस को [सौंपा गया], वैसा ही खतनारहितों [अन्य-जाति] के लिये मुझे सुसमाचार सुनाना सौंपा गया। (क्योंकि जिसने पतरस से खतना किए हुओं में प्रेरिताई का कार्य बड़े प्रभाव सहित करवाया, उसी ने मुझ से भी अन्य-जातियों में प्रभावशाली कार्य करवाया)…” (गलातियों २:७-८)

पौलुस का संदेश बहुत सीधा था:

क्योंकि विश्‍वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन याहुवाह का दान है, और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे। (देखें इफिसियों २:८-९)

शैतान ने अन्य-जातियों के बीच पौलुस की सेवकाई में भाग लेने की जबरदस्त सफलता में बाधा डालने की कोशिश की। उसने फरीसियों को जो मसीहियत में “धर्मांतरित” हुए थे, पौलुस के संदेश ‘विश्वास के द्वारा उद्धार’ को भ्रष्ट करने के लिए प्रेरित किया। फरीसी-मसीहियों द्वारा लाया गया संदेश था: कामों द्वारा उद्धार। फरीसी हमेशा अतिरिक्त नियमों को याहुवाह के व्यवस्था में जोड़ देते थे। ये “पूर्वजों की परंपरा” जाने जाते थे। याहुशूआ ने बार बार दिव्य व्यवस्था से जोड़े गये इन फरीसियों के नियमों की निंदा की।

“फरीसी…एक ऐसे भारी बोझ को जिसको उठाना कठिन है, बाँधकर उन्हें मनुष्यों के कन्धों पर रखते हैं।” (देखें मत्ती २३:२,४)

जब फरीसियों ने याहुशूआ से पुछा कि उसके चेले पूर्वजों की परंपरा को क्यों तोड़ते, उसका जवाब था:

तुम भी अपनी परम्पराओं के कारण क्यों परमेश्‍वर की आज्ञा टालते हो? (देखें मत्ती १५:३)

फरीसी-मसीहीयों, जो जुडाइज़र भी जाने जाते थे, धर्मांतरित अन्य-जाति को सिखाया कि बचने के लिए उन्हें खतना अवश्य करवाना होगा।

“फिर कुछ लोग यहूदिया से आकर भाइयों को सिखाने लगे : “यदि मूसा की रीति पर तुम्हारा खतना न हो तो तुम उद्धार नहीं पा सकते।” जब पौलुस और बरनबास का उनसे बहुत झगड़ा और वाद-विवाद हुआ तो यह ठहराया गया कि पौलुस और बरनबास…इस बात के विषय में प्रेरितों और प्राचीनों के पास यरूशलेम को जाएँ…

“जब वे यरूशलेम पहुँचे, तो कलीसिया और प्रेरित और प्राचीन उनसे आनन्द के साथ मिले…परन्तु फरीसियों के पंथ में से जिन्होंने विश्‍वास किया था, उनमें से कुछ ने उठकर कहा, “उन्हें खतना कराने और मूसा की व्यवस्था को मानने की आज्ञा देनी चाहिए।’


“तब प्रेरित और प्राचीन इस बात के विषय में विचार करने के लिये इकट्ठे हुए।” (प्रेरितों १५:१-६)

रेम्ब्रैंट का

रेम्ब्रांट का “प्रेरित पौलुस”

प्रेरितो ने निष्कर्ष निकाला कि जुडाइज़र गलत थे। धर्मान्तरित अन्य-जातियों को उद्धार के लिए खतना जरूरी के रूप में आवश्यक नहीं था। यरूशलेम के हुक्मनामे में कहा गया:

“जो अन्य-जातियों में से हैं, प्रेरितों और प्राचीन भाइयों…हमने सुना है कि हम में से कुछ ने वहाँ जाकर, तुम्हें अपनी बातों से घबरा दिया; और तुम्हारे मन उलट दिए हैं परन्तु हम ने उनको आज्ञा नहीं दी थी। इसलिये हम ने एक चित्त होकर ठीक समझा कि…इन आवश्यक बातों को छोड़, तुम पर और बोझ न डालें; कि तुम मूरतों पर बलि किए हुओं से और लहू से, और गला घोंटे हुओं के मांस से, और व्यभिचार से दूर रहो। इनसे दूर रहो तो तुम्हारा भला होगा। आगे शुभ।” (प्रेरितों १५:२३-२९)

इस मुद्दे को हमेशा के लिए सुलझ जाना चाहिए था, परंतु फरीसियों के साथ चले आ रहे संघर्ष एक समस्या बनी रही जिस पर पौलुस को बार-बार संबोधन करने के लिए बुलाया गया था। यह परिस्थिति थी जब पौलुस ने अपना पत्र गलातियों को लिखा था। जुडाइज़र ने अन्य-जाति को बताया था कि विश्वास के द्वारा उद्धार काफी नहीं है। बचाये जाने के लिए, उन्हें खतना भी अवश्य करवाना होगा।

“परंतु जब गलाती विश्वास से हटकर कामों की ओर मुड़ गये, वे उन कामों को करने से नहीं रूके जिनकी फरीसियों ने करने की सिफारिश और आग्रह किया था। पूर्व में मूर्तिपूजक रह चुके, अब वापस विश्वास से हटकर कामों की ओर मुड़ गये, अपने ही बुतपरस्त कामों के साथ ही साथ वे उन कामोंं को करने लगे जिन कामों को फरीसियों ने सिफारिश की थी। आत्मा से शरीर के ओर मुड़ जाने के बाद, केवल यह उम्मीद हो सकती थी कि वे ऐसा करेंगे: यह देखकर कि फरीसियों के तरीके की तुलना में विधर्मियों के तरीके से उनका शरीर को अधिक संतुष्टि मिल सकती थी, क्योंकि ये वो चीजें थीं जिसके लिए उनका शरीर पहले ही आदी हो गया था।” (“Studies in Galatians,” A. T. Jones, Review & Herald, 1900, #20.)

जब पौलुस को यह समाचार मिला, वह हृदय में पीडित हो गया था। वह जानता था कि “व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा, इसलिये कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है।” (रोमियों ३:२०). पौलुस तुरंत ही गलातियों को लिखा:

“मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर केवल…मसीह पर विश्‍वास करने के द्वारा धर्मी ठहरता है…इसलिये कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा।

“हे निर्बुद्धि गलातियो, किसने तुम्हें मोह लिया है?


“मैं तुम से केवल यह जानना चाहता हूँ कि तुम ने आत्मा को, क्या व्यवस्था के कामों से या विश्‍वास के समाचार से पाया? क्या तुम ऐसे निर्बुद्धि हो कि आत्मा की रीति पर आरम्भ करके अब शरीर की रीति पर अन्त करोगे?” (गलातियों २:१६, ३:१-३)

पौलुस उनके विश्वास को सभी के लिए पर्याप्त उद्धारकर्ता के लहू कि योग्यता में पुन: स्थापित करना चाहता था। मनुष्य के द्वारा किये हुए कोई भी कार्य किसी को भी नहीं बचा सकता। यह गलातियों के अध्याय ४ में है, कि पौलुस के गलातियों को संदेश के द्वारा बहुत से लोग भ्रमित हो गये।

पहले तो तुम याहुवाह को न जानकर उनके दास थे जो स्वभाव से परमेश्‍वर नहीं,

पर अब जो तुम ने याहुवाह को पहचान लिया…तो उन निर्बल और निकम्मी आदि-शिक्षा की बातों की ओर क्यों फिरते हो, जिनके तुम दोबारा दास होना चाहते हो?


तुम दिनों और महीनों और नियत समयों और वर्षों को मानते हो। मैं तुम्हारे विषय में डरता हूँ, कहीं ऐसा न हो कि जो परिश्रम मैं ने तुम्हारे लिये किया है वह व्यर्थ ठहरे। (देखें गलातियों ४:८-११)

आदमी बाइबल पढ़ रहा हैक्योंकि गलातियों को संदेश, जुडाइज़र्स के खारिज करने के स्पष्ट उद्देश्य के लिए था, बहुतों ने मान लिया की “निर्बल और निकम्मी आदि-शिक्षा की बातों” जो पौलुस संदर्भित कर रहा है, वे याहुवाह की व्यवस्था होनी चाहिए, विधियां और नियमों के साथ। कथन, “तुम दिनों और महीनों और नियत समयों और वर्षों को मानते हो” को सबूत के रूप में पेशकश किया जाता है कि सब्बात और वार्षिक पर्व अब और बाध्यकारी नहीं है और उन्हें क्रुस पर चढ़ा दिया गया था। यह याद रखना चाहिए कि गलाती अन्य-जाति थे। गलाती वापस उन चीजों के तरफ नहीं मुड़ सकते थे जिसका उन्होंने सर्वप्रथम मसीही बनने से पहले विश्वास नहीं किया था!

“जो कोई भी गलातियों को लिखा पत्री को पढ़ता है, और सोचता है जैसे पढ़ता है, जानना चाहिए कि गलाती यहूदी नहीं थे। वे मुर्तिपूजकों में से परिवर्तित हुए। इसलिए, उनके परिवर्तन होने से पहले उनका यहूदियों द्वारा अभ्यास किए गए किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज़ों से कुछ लेना-देना नहीं था। उनका यहूदियों के साथ कुछ भी एकसमान नही था।

“परिणाम स्वरूप, जब वे पुन: ‘निर्बल और निकम्मी आदि-शिक्षा की बातों’ की ओर मुड़े जिनकी दासत्व में जाने की इच्छा कर रहे थे, स्पष्ट है कि वे यहूदियों की किसी प्रथाओं की ओर वापस नहीं जा रहे थे। वे अपने पुराने मूर्तिपूजक रीति-रिवाज़ों की ओर वापस जा रहे थे।” (Glad Tidings, E. J. Waggoner,175.)

पौलुस दिव्य व्यवस्था से प्रेम करता था। उसने उपेक्षा जनक ढंग से याहुवाह की दिव्य व्यवस्था को कभी भी “निर्बल और निकम्मी” के रूप में संदर्भित नहीं किया होगा। बल्कि, उसने जोर देकर कहा:

“इसलिये व्यवस्था पवित्र है, और आज्ञा भी ठीक और अच्छी है। (रोमियों ७:१२)

प्रेरित ने अभी कहा था कि [याहुवाह]…को जानने से पहले, वे उनके दास थे जो स्वभाव से परमेश्वर नहीं थे, और अब, [याहुवाह]…से हटकर, वे वापस उन बातों की ओर और दोबारा उस दासता की ओर मुड़ गये। और…ये ‘आदि-शिक्षा की बातों’ जिसके लिए वे पहले से दासता में थे और जिसमें अब दोबारा से दासत्व में थे, वे “संसार की आदि-शिक्षा की बातें” थी।…” (“Studies in Galatians,” A. T. Jones, Review & Herald, 1900, #20.)

पौलुस की गलातियों को “दिनों और महीनों और नियत समयों और वर्षों” को मानने के लिए फटकार मारने के द्वारा, कुछ ने दावा किया है कि चंद्र-सब्बात गलत है। हालांकि, पौलुस वैसा नहीं कह रहा था। याहुवाह के कैलेंडर में, पवित्र दिनों, उत्सव-संबंधी सप्ताह, और परमविश्राम का वर्ष है। परंतु पवित्र महीने या ऋतुऐं नहीं हैं। पौलुस मूर्तिपूजक प्रथाओं को संदर्भित कर रहा था, इस प्रकार यह पुष्टि कर रहा था कि “निर्बल और निकम्मी आदि-शिक्षा की बातें” जिसकी ओर गलाती वापस लौट गए, वे मूर्तिपूजक संस्कार थे। गलातियों को लौटने वाले मूर्तिपूजक प्रथाओं में से कुछ समारोहों का पालन करना था। ये वही पालन करने वाले समारोह थे जिनके खिलाफ याहुवाह ने विशेष रूप से चेतावनी दी जब इस्राएलियों ने कनान में प्रवेश किया था:

“जब तू उस देश में पहुँचे जो…[तेरा एलोहीम याहुवाह] तुझे देता है, तब वहाँ की जातियों के अनुसार घिनौना काम करना न सीखना। तुझ में कोई ऐसा न हो जो…शुभ-अशुभ मुहूर्त्तों का माननेवाला, या टोन्हा, या तान्त्रिक, या बाजीगर, या ओझों से पूछनेवाला, या भूत साधनेवाला, या भूतों का जगानेवाला हो। क्योंकि जितने ऐसे ऐसे काम करते हैं वे सब…[याहुवाह] के सम्मुख घृणित हैं; और इन्हीं घृणित कामों के कारण…[तेरा एलोहीम याहुवाह] उनको तेरे सामने से निकालने पर है।” (व्यवस्थाविवरण १८:९-१२)

गलातियों एक शक्तिशाली पुष्ट समर्थन है कि विश्वास के द्वारा, उद्धार सभी के लिए एक मुफ्त दान है न कि कामों के द्वारा, कि कोई घमंड करे।

क्योंकि याहुशूआ में न खतना और न खतनारहित कुछ है, परन्तु नई सृष्‍टि। जितने इस नियम पर चलेंगे उन पर, और परमेश्वर के इस्राएल पर शान्ति और दया होती रहे। (गलातियों ६:४, १५-१६)

लड़की बाइबल पकड़े फूलों का एक क्षेत्र में बैठी है


शैतान “झूठ का पिता”
कहलाता है. यहुशुआ ने स्वयं यह कहा कि “ वह तो आरम्भ से हत्यारा है और सत्य पर
स्थिर न रहा, क्योंकि सत्य उसमें है ही नहीं. ……क्योंकि वह झूठा है वरन झूठ का
पिता है.” (यहुन्ना ८:४४) धोखा प्राकृतिक रूप से ही अस्थिर होता है. इसके पास कभीtruth mixed with liesवह शक्ति नहीं हो सकती जो सत्य में होती है. झूठ अकेला हो तो हमेशा धोखा देने में
असफल रहता है. शैतान यह जानता है, इसीलिए वह अपने झूठ को सत्य के साथ लपेट देता
है. अपने झूठ को वह सत्य के जितना नजदीक रख सकता है उतना ही अधिक वह भ्रामक हो
सकेगा.

शैतान जानता है कि
व्यवस्था यहुवह के पवित्र चरित्र की प्रतिलिपी है. इसीलये यह व्यवस्था अपने देने
वाले के समान कभी न बदलने वाली है. शैतान चाहता है कि लोग यहुवह की पवित्र
व्यवस्था को तोड़ें. यह करने के लिये आवश्यक है कि शैतान लोगों को धोखा दे कि वे
यह विचार करने लगें कि यहुवह की व्यवस्था बदल गई है या अब
यह आवश्यक नहीं है व्यवस्था का पालन किया जाए. इस मूर्खतापूर्ण झूठ पर कोई तब तक विश्वास नहीं करेगा जब तक
यह सत्य के साथ लपेटा गया न हो. इसलिये शैतान अपने झूठ को सिध्द करने के लिये धर्मग्रन्थ
को प्रस्तुत करता है. इफिसियों २:१५ ऐसा वचन है जिसका सन्दर्भ हमेशा यह सिध्द करने
के लिये लिया जाता है कि पवित्र व्यवस्था अब बन्धनकारी नहीं है. वास्तव में यह
पूर्ण वाक्य नहीं है. ये सन्दर्भ में से लिये गए दो शब्द मात्र है जी शैतान के झूठ
के पक्ष में लपेटे जाते हैं.

“और अपने शरीर में बैर अर्थात् वह व्यवस्था जिसकी आज्ञायें
विधियों की रीति पर थीं, मिटा दिया कि दोनों से अपने में एक नया मनुष्य उत्पन्न कर
के मेल करा दे.” (इफिसियों २:१५)

यह विचार भी अत्यन्त नामुनासिब होगा कि सभी न्याय और
धार्मिक व्यवस्था के पिता ने अपनी स्वयं की पवित्र व्यवस्था का लोप कर दिया हो.
कोई भी मानव सरकार बिना कानून-व्यवस्था के नहीं चलती है. इसी प्रकार पवित्र सरकार
भी. यह दावा करने के लिये पौलुस अन्तिम व्यक्ति होगा कि क्रूस पर व्यवस्था का लोप
हो गया जिसने स्वयं यह कहा कि :

gavel and scales“ इसलिये व्यवस्था पवित्र है, और आज्ञा भी ठीक और अच्छी
है.”(रोमियों ७:१२)

यहुशुआ इसलिये नहीं आया कि व्यवस्था का लोप करे उसने कहा :

“ यह न समझो, कि मैं व्यवस्था या भविष्यवक्ताओं कि पुस्तकों
को लोप करने आया हूँ, लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ. क्योंकि मैं तुमसे
सच कहता हूँ, कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या
एक बिंदु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा. इसलिए जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में
से किसी एक को भी तोड़े, और वैसा ही लोगों को सिखाये, वह स्वर्ग के राज्य में सब से
छोटा कहलाएगा; परन्तु जो कोई उन आज्ञाओं का पालन करेगा और उन्हें सिखाएगा, वही
स्वर्ग के राज्य में महान कहलाएगा.” (मत्ती ५:१७-१९).

यहुशुआ ने पूर्णरूप से व्यवस्था का पालन किया. प्रत्येक बात
में पवित्र व्यवस्था का पालन कर के यहुशुआ ने एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जिसका सभी
को अनुसरण करना चाहिए.

“…क्योंकि यहुशुआ भी तुम्हारे लिये दुःख उठाकर तुम्हें एक
आदर्श दे गया कि तुम भी उसके पद चिन्हों पर चलो. न तो उसने पाप किया और न उसके
मुँह से छल कि कोई बात निकली.”(१पतरस २:२१-२२)

धर्मशास्त्र हमेशा यह सिखाता है कि पवित्र व्यवस्था शाश्वत
है. इसका पालन स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में अनन्तकाल तक निरन्तर चलने वाले चक्र में
किया जाना चाहिए. यदि बाइबल का कोई सन्दर्भ यह सिध्द करने के लिये उपयोग किया जावे
कि व्यवस्था क्रूस पर चढाई जा चुकी है तो यह शैतान के झूठ को धर्मग्रन्थ के साथ लपेटना है कि पवित्र
व्यवस्था का पालन करने की आवश्यकता नहीं है. इफिसियों २;१५ के स्पष्ट और सही अर्थ
को तब ही समझा जा सकता है जब इस सन्दर्भ के पूरे अंश को पढ़ा जाए.

“ जिनमें तुम पहले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार
के हाकिम अर्थात् उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में
कार्य करता है.

परन्तु यहुवह ने जो दया का धनी है, अपने उस बड़े प्रेम के
कारण जिससे उसने हमसे प्रेम किया जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे तो हमें यहुशुआ
के साथ जिलाया ( अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है ) और यहुशुआ में उसके साथ
उठाया गया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया.

इस कारण स्मरण करो कि तुम जो शारीरिक रीति से अन्यजाति हो (
और जो लोग शरीर में हाथ के किये गए खतने से खतनेवाले कहलाते हैं, वे तुमको
खतनारहित कहते हैं ), तुम लोग उस समय यहुशुआ से अलग, और इस्राएल कि प्रजा के पद से
अलग किए हुए, और प्रतिज्ञा कि वाचाओं के भागी न थे, और आशाहीन और जगत में ईश्वर
रहित थे पर अब यहुशुआ में तुम जो पहले दूर थे यहुशुआ के लहू के द्वारा निकट हो गये
हो. क्योंकि वही हमारा मेल है जिसने दोनों को एक कर दिया और अलग करने वाली दीवार
को जो बीच में थी ढा दिया, और अपने शरीर में बैर अर्थात् वह व्यवस्था जिसकी
आज्ञाएँ विधियों कि रीति पर थीं, मिटा दिया कि दोनों से अपने में एक नया मनुष्य
उत्पन्न कर के मेल करा दे, और क्रूस पर बैर को नाश करके इसके द्वारा दोनों को एक
देह बना कर यहुवह से मिलाए. उसने आकर तुम्हें जो दूर थे और उन्हें जो निकट थे,
दोनों को मेलमिलाप का सुसमाचार सुनाया.” (इफिसियों २:२,४-६,११-१७)

पौलुस सभी मूर्तिपूजकों लिखकर यह स्मरण दिला रहा है कि
विश्वास में आने के पहले वे संसार की रीति पर चलते थे (वचन २) संसार कि रीति
मनुष्य के द्वारा बनाई गई परम्पराएँ है जो पक्षपात और अनयता की ओर अग्रसर करती
हैं. इस्राएली इस ग्रह के बहुत ही पक्षपातपूर्ण लोगों में से थे. यहुवह की योजना
इस्राइली के लिए यह थी कि वे “जगत कि ज्योति बन जाएँ”. (मत्ती ५:१४) इसके स्थान पर
इस्राइली अपनी उत्कृष्टता में दृढ रहकर बाहरी लोगों से कन्नी काटकर एक संकीर्ण
समाज बन गये. पौलुस अलग अलग लोगों के बीच पक्षपातपूर्ण विभाजन की ओर इंगित करते
हुए कहता है कि “ जिनमें तुम पहले इस संसार कि रीति पर और आकाश के अधिकार के हाकिम
अर्थात् उस आत्मा के अनुसार चलते थे…(इफिसियों २:२) शैतान की हमेशा यह
कार्यप्रणाली रही है कि वह लोगों के बीच घृणा, सन्देह, पक्षपात और विभाजन उत्पन्न
करे. “यही संसार की रीति” है. यहुशुआ ईश्वरीय प्रेम के द्वारा एकता लाने के लिए
आया. वह गरीबों के घर में भी उतना ही सुखी और स्वीकार करने वाला था जितना कि
अमीरों के महलों में. “यहुवह किसी का पक्ष नहीं करता, वरन हर जाति में जो उससे
डरता और धर्म के काम करता है, वह उसे भाता है”.(प्रेरितों १०:३४-३५) यह एक ऐसी
धारणा थी जो चेलों को भी आरम्भ में समझ नहीं आई.
पहले स्वर्गीय स्वप्न के भेजे जाने के बाद ही पतरस के लिए मूर्तिपूजक के घर
में कदम रखना सम्भव हो सका वह भी बाद में पक्षपात से भरे इस्राइली लोगों के दबाव
के अधीन हो गया.

“ इसलिए कि याकूब की ओर से कुछ लोगों के आने से पहले वह
अन्यजातियों के साथ खाया करता था, परन्तु जब वे आए तो खतना किए हुए लोगों के डर के
मारे वह पीछे हट गया और किनारा करने लगा.” (गलतियों २:१२)

यह देखकर कि क्या हो रहा है पौलुस ने तत्काल इस विभाजनात्मक
आचरण पर रोक लगा दी. “Ordinance” शब्द जिसे पौलुस ने तब संदर्भित किया जब वह “ the law of commandments contained
in ordinances” (इफिसियों २:१५) में कह रहा था, यह शब्द “dogma”(#1378) से आता है. यह वही “ पूर्वजों की
परम्परा” है जिसे यहुशुआ ने तब निर्दिष्ट किया जब उसने सुस्पष्ट ढंग से पूछा “ तुम
भी अपनी परम्पराओं के कारण क्यों यहुवह की आज्ञाओं को टालते हो ?” (मत्ती १५:३) wall of separation destroyed by Yahushuaव्यवस्था
औए आज्ञाएँ जिनका कि पौलुस ने इफिसियों २:१५ में उल्लेख किया वह ईश्वरीय व्यवस्था
नहीं है जिसे पौलुस ने पवित्र, न्यायोचित और अच्छी होना स्वीकार किया. पौलुस मनुष्यों द्वारा बनाई गई परम्परा , लादे
गए कष्टदायक प्रतिबन्ध जो उन धार्मिक अगुओं द्वारा जो लोगों को सिखाते हैं कि वे
स्वर्ग के लिए अपना मार्ग उनके (मनुष्यों) द्वारा बनाये नियमों को पालन कर तैयार
कर सकते हैं. मनुष्यों द्वारा लादे गये ये नियम और प्रतिबन्ध ही मुख्यतः पक्षपात, सन्देह,
घृणा और इस्राइलियो और मूर्तिपूजकों के बीच अलगाव की भावनाओं के लिये जिम्मेदार
हैं. ये मनुष्यों द्वारा निर्मित नियम ही इस्राइलियो और मूर्तिपूजकों के बीच
विभाजन की “ऊँची बीच की दीवार” के लिए जिम्मेदार हैं. पौलुस का इशारा इफिसियों २
में यह था कि यहुशुआ इसलिये आया कि सब जगह के लोगों को छुटकारा प्रदान करे. यहुशुआ
ने न सिर्फ मनुष्यों का यहुवह के साथ परन्तु मनुष्यों का एक दूसरे के साथ भी सामन्जस्य
स्थापित किया. अब इस्राइलियो और मूर्तिपूजकों, नर और नारी, बचाए गए और अभिशप्त के
बीच अलगाव की कोई दीवार नहीं रही.

“ पर अब मसीह यहुशुआ में तुम जो पहले दूर थे, यहुशुआ के लहू
के द्वारा निकट हो गये हो. क्योंकि वही हमारा मेल है जिसने दोनों को एक कर लिया और
अलग करने वाली दीवार को जो बीच में थी ढा दिया, और अपने शरीर में बैर अर्थात् वह
व्यवस्था जिसकी आज्ञाएँ विधियों की रीति पर थीं, मिटा दिया की दोनों से अपने में
एक नया मनुष्य उत्पन्न कर के मेल करा दे”. (इफिसियों २:१३-१५)

यहुशुआ पवित्र व्यवस्था की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति था. इसलिए
उसने क्षुद्र मस्तिष्क के लोगों द्वारा लादी गई मानवीय परम्परा और पक्षपात को तोड़
दिया. व्यवस्था की चरम पूर्ति प्रेम है.

“ क्योंकि सारी व्यवस्था इस एक ही बात में पूरी हो जाति है,
“तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख.” (गलतियों ५:१५)

“ प्रेम पड़ोसी की कुछ बुराई नहीं करता, इसलिये प्रेम रखना
व्यवस्था को पूरा करना है.” (रोमियों १३:१०)

यहुशुआ में सभी एक दूसरे से प्रेम में जुड़े हुए हैं. इफिसियों
२, नई प्राप्त हुई एकता और यहुशुआ द्वारा लाई गई भाई-चारे की प्रीति और उसके
चिरस्थायी पवित्र, न्यायसंगत और अच्छी व्यवस्था के पालन में आनन्द करता है.

याह
में कोई पूरब या पश्चिम नहीं है,

उसमें
कोई उत्तर या दक्षिण नहीं है;

परन्तु
प्रेम की एक महान सहभागिता

पृथ्वी
के सर्वत्र भाग में है.

उसी
में सच्चे हिर्दय प्रत्येक जगह

उनकी
उच्च सहभागिता पाएंगे;

उसकी
सेवा सुनहरी डोर,

मानवता
के लिये गहरा बन्धन है.

तब
विश्वासी सदस्यों अपने हाथ मिला लो,

तुम्हारी
कोई भी जाति क्यों न हो!

जो
मेरे पिता की सेवा पुत्र के समान करता है

वह
निश्चय मेरा वंश है.

याह
में अब पूरब और पश्चिम,

उत्तर और दक्षिण आपस में एक हो;

सारी
मसीही आत्माएँ उसमे एक हैं

पृथ्वी
के सर्वत्र भाग में.


दस आज्ञाएँ = यहुवह के अपरिवर्ती
गुण की प्रतिलिपी:

“यह न समझो, की मैं व्यवस्था या
भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों का लोप करने आया हूँ, लोप करने नहीं परन्तु पूरा करने
आया हूँ”. (मत्ती ५:१७)

“ धन्य हैं वे, जो अपने वस्त्र धो
लेते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मिलेगा, और वे
फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करेंगे”. (प्रकाशितवाक्य २२:१४). [नया यरूशलेम]

सुसमाचार प्रचार के लिए स्वर्ग के उपहार

याहुवाह ने पृथ्वी पर अपने लोगों के ऊपर प्रचूर दान प्रदान कर दिए हैं। सबसे पेचीदा, और अभी तक कम समझा गया स्वर्ग से प्रदान किया गया दान, भाषाओं में बोलने का है। बहुत से मसीही लोगों का आज मानना है कि, जब तक व्यक्ति को “पवित्र आत्मा का दान” नहीं मिल जाता और “अन्य-अन्य भाषा में बोल” नहीं सकता हो तो वह पुरुष/स्त्री अभी तक “पवित्र आत्मा से बपतिस्मा” पाया हुआ नहीं है। अन्य भाषाओं में बोलने के प्रयोग को एक परीक्षण के तौर पर यह साबित करने के लिए किया जाता है कि व्यक्ति को बचा लिया गया है या नहीं? “भाषाओं में बोलना” जिसका अभ्यास आज मसीहियों के द्वारा किया जाता है, जब वे कहते हैं कि , हम प्रार्थना या उपासना कर रहे हैं, दरअसल बाइबिल आधारित अन्य भाषाओं में बोलने की वास्तविकता के विपरीत है।

याहुशुआ के स्वर्ग में वापस चढ़ने से ठीक पहले उसने अपने चेलों से कहा:

“तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो। और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह होंगे कि वे मेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालेंगे, नई-नई भाषा बोलेंगे।” (मरकुस १६:१५,१७)

अन्य भाषाओं में बोलना imageशिष्यों को उद्धार की सच्चाइयों को पुरी दुनिया में फैलाने का कार्य दिया गया था! उन्हें ऐसा करने के लिए, याहुशुआ ने वादा किया कि उन्हें “नई भाषा” या “अन्य भाषा” को सक्षमता से बोलने में पुरस्कृत किया जाएगा। यह अनुपम दान सबसे पहले “पिन्तेकुस्त के दिन” प्रदान किया गया था, और इसने बहुत सी आत्माओं के उद्धार पाने में अगुवाई की।

“जब पिन्तेकुस्त का दिन आया, तो वे सब एक जगह इकट्ठे थे। और एकाएक आकाश से बड़ी आंधी की सी सनसनाहट का शब्द हुआ, और…वे सब पवित्र आत्मा से भर गए, और जिस प्रकार आत्मा ने उन्हें बोलने की सामर्थ्य दी, वे अन्य अन्य भाषा बोलने लगे।

“और आकाश के नीचे की हर एक जाति में से भक्त यहूदी यरूशलेम में रहते थे। जब वह शब्द हुआ तो भीड़ लग गई और लोग घबरा गए, क्योंकि हर एक को यही सुनाई देता था, कि ये मेरी ही भाषा में बोल रहे हैं।

“और वे सब चकित और अचम्भित होकर कहने लगे; देखो, ये जो बोल रहे हैं क्या सब गलीली नहीं? तो फिर क्यों हम में से हर एक अपनी अपनी जन्म भूमि की भाषा सुनता है। हम जो पारथी और मेदी और एलामी लोग और मिसुपुतामिया और यहूदिया और कप्पदूकिया और पुन्तुस और आसिया और पमफूलिया और मिस्र और लिबूआ देश जो कुरेने के आस पास है, इन सब देशों के रहनेवाले और रोमी प्रवासी, क्या यहूदी क्या यहूदी मत धारण करनेवाले, क्रेती और अरबी भी हैं। परंतु अपनी अपनी भाषा में उन से…[याह] के बड़े बड़े कामों की चर्चा सुनते हैं।

“और वे सब चकित हुए, और घबराकर एक दूसरे से कहने लगे कि यह क्या हुआ चाहता है?” (प्रेरितों के काम २:१-१२)

पौलुस ने जल्दी से भीड़ को समझाया कि क्या हो रहा था:

पतरस उन ग्यारह के साथ खड़ा हुआ और ऊंचे शब्द से कहने लगा, कि हे यहूदियों, और हे यरूशलेम के सब रहनेवालों, यह जान लो और कान लगाकर मेरी बातें सुनो। परन्तु यह वह बात है, जो योएल भविष्यद्वक्ता के द्वारा कही गई है। कि परमेश्वर कहता है, कि अन्त कि दिनों में ऐसा होगा, कि मैं अपना आत्मा सब मनुष्यों पर उडेलूंगा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारी बेटियाँ भविष्यद्वाणी करेंगी और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे, और तुम्हारे पुरनिए स्वप्न देखेंगे (प्रेरितों के काम २:१४,१६,१७)

पतरस का भाषण, चाहे उनकी मातृ भाषा जो भी हो, वहाँ मौजूद सभी लोगों की समझ में आ गया था। नतीजा अद्भुत था!

“सो जिन्होंने उसका वचन ग्रहण किया उन्होंने बपतिस्मा लिया; और उसी दिन तीन हजार मनुष्यों के लगभग उन में मिल गए। और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे।” (प्रेरितों के काम २:४१,४२)

सच्चा “भाषाओं का दान” हमेशा पिता की बढ़ाई करता है, और इसे केवल उन लोगों के साथ “दिव्य सत्य” का संचार करने के उद्देश्य से दिया गया था जो दूसरे प्रकार से बोले जा रहे शब्दों को समझ नहीं सकते।

अन्य भाषाओं में बोलना image

सच्चा “भाषाओं का दान” हमेशा पिता की बढ़ाई करता है, और इसे केवल उन लोगों के साथ “दिव्य सत्य” का संचार करने के उद्देश्य से दिया गया था जो दूसरे प्रकार से बोले जा रहे शब्दों को समझ नहीं सकते। इसके विपरीत, बहुतों के द्वारा निकाली जाने वाली आवाज़ जो दावा करते हैं कि उनके पास “अन्य भाषा का दान” है, यह सिवाए बिना अर्थ वाली बक बक या बड़बड़ाहट के अलावा और कुछ नहीं। बनाई गई ध्वनियाँ अलग भाषाएँ नहीं होती और न ही वे निश्चित रूप से किसी को भी सत्य और धार्मिकता में निर्देशित नहीं करती है। वास्तव में, आज लोगों द्वारा “glossolalia (ग्लोसोलेलिआ)” या “अन्य-अन्य भाषा” में बोलने का अभ्यास पवित्र शास्त्र में दिए गए दिशा-निर्देश के बिलकुल विपरीत में है जो प्रकट करता है कि यह असली है या नहीं।

याहुशुआ ने खुद स्पष्ट रूप से चेताया है कि,

“प्रार्थना करते समय अन्यजातियों की नाईं बक बक न करो; क्योंकि वे समझते हैं कि उनके बहुत बोलने से उन की सुनी जाएगी। सो तुम उन की नाईं न बनो, क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे मांगने से पहिले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या क्या आवश्यक्ता है।” (मत्ती २:६-७)

नए नियम के किसी भी लेखक की तुलना में, पौलुस सब से ज्यादा भाषाओं के दान पर लिखा। उसने आधुनिक अर्थहीन शोर के खिलाफ चेतावनी दी जिसे आज बहुत से लोग “अन्य-अन्य भाषाओं का दान” कहते हैं।

“पर अशुद्ध बकवाद से बचा रह; क्योंकि ऐसे लोग और भी अभक्ति में बढ़ते जाएंगे।” (२ तीमुथियुस २:१६)

पौलुस समझ गया था कि सभी भाषाएँ एक “दिव्य दान” है जो सिर्फ संचार करने के उद्देश्य से दिया गया था, परंतु यदि कोई व्यक्ति नहीं समझता की अन्य व्यक्ति क्या कह रहा है, तो संचार उत्पन्न नहीं होता! तब कोई भी भाषा बस एक व्यर्थ और गुडमूड ध्वनि बन जाती है: अर्थहीन बडबड़। एक समय पर, कुरिन्थुस में विश्वासी जन “भाषाओं के दान” को पाने के लोभ के चलते खतरे में पड़ गए थे, ठीक उसी वजह के लिए जिसे आज बहुत से लोग चाहते हैं – उन लोगों को ये मानना था कि ये उन्हें और भी पवित्र और महत्वपूर्ण दिखने वाला बना देगा। पौलुस ने तुरंत ही उन्हें सीधा किया कि बोलने वाले शब्द, जिसे कोई नहीं समझता सत्य का संचार नहीं करता और इस प्रकार इसके मूल उद्देश्य को पूरा नहीं करता जिस कारण से स्वर्ग “भाषाओं का दान” देता है!

“इसलिये हे भाइयों, यदि मैं तुम्हारे पास आकर अन्य-अन्य भाषा में बातें करूं, और प्रकाश, या ज्ञान, या भविष्यद्वाणी, या उपदेश की बातें तुम से न कहूं, तो मुझ से तुम्हें क्या लाभ होगा?

“इसी प्रकार यदि निर्जीव वस्तुएं भी, जिन से ध्वनि निकलती है जैसे बांसुरी, या बीन, यदि उन के स्वरों में भेद न हो तो जो फूंका या बजाया जाता है, वह क्योंकर पहचाना जाएगा?

“ऐसे ही तुम भी यदि जीभ से साफ बातें न कहो, तो जो कुछ कहा जाता है? वह क्योंकर समझा जाएगा? तुम तो हवा से बातें करनेवाले ठहरोगे।

“इसलिये यदि मैं किसी भाषा का अर्थ न समझूं, तो बोलने वाले की दृष्टि में परदेशी ठहरूंगा; और बोलने वाला मेरे दृष्टि में परदेशी ठहरेगा।” (१ कुरिन्थियों १४:६,७,९,११)

पौलुस यह बताता है कि यदि बोली जा रही भाषा को समझा नहीं जा सकता या किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा अनुवादित नहीं किया जा सकता जो वही भाषा बोलता हो, तो “अन्य अन्य भाषा में” बोलने वाले व्यक्ति को चुप रहना होगा।

“यदि अन्य भाषा में बातें करनी हो तो…एक व्यक्ति अनुवाद करें। परन्तु यदि अनुवाद करने वाला न हो, तो अन्य भाषा बोलने वाला कलीसिया में शान्त रहे।” (१ कुरिन्थियो १४:२७-२८)

पौलुस को “भाषाओं के दान” में विश्वास था। उसने इसका बहुत बार उपयोग भी किया! परंतु वह समझ गया कि सच्चा “भाषाओं का दान” हमेशा से एक तर्कसंगत भाषा थी जो समझी जा सकती थी।

अन्य भाषाओं में बोलना image

पौलुस को “भाषाओं के दान” में विश्वास था। उसने इसका बहुत बार उपयोग भी किया! परंतु वह समझ गया कि सच्चा “भाषाओं का दान” हमेशा से एक तर्कसंगत भाषा थी जो समझी जा सकती थी।

“मैं अपने…[एलोहीम] का धन्यवाद करता हूं, कि मैं तुम सब से अधिक “अन्य अन्य भाषा” में बोलता हूँ परन्तु कलीसिया में अन्य भाषा में दस हजार बातें कहने से यह मुझे और भी अच्छा जान पड़ता है, कि औरों को सिखाने के लिए बुद्धि से पाँच ही बाते कहूँ। (१ कुरिन्थियों १४:१८-१९)

पौलुस ने जो लोग अर्थहीन शोर मचाते थे बनाम, और जो लोग वास्तव में सत्य को विदेशी भाषा में दूसरों को समझाने की प्रतिभा के दान से पुरस्कृत किए गये थे, उनके बीच के अंतर को स्पष्ट किया कि:

जो अन्य भाषा में बातें करता है, वह अपनी ही उन्नति करता है; परन्तु जो भविष्यद्वाणी करता है, वह कलीसिया की उन्नति करता है। मैं चाहता हूँ कि तुम सब अन्य भाषाओं में बातें करो, परन्तु अधिकतर यह चाहता हूं कि भविष्यद्वाणी करो: क्योंकि यदि “अन्य-अन्य भाषा” बोलने वाला कलीसिया की उन्नति के लिये अनुवाद न करें भविष्यद्वाणी करने वाला उस से बढ़कर है।” (१ कुरिन्थियों १४:४-५)

“भाषाओं का दान” बस यह है कि: यह एक उपहार है, जो स्वर्ग द्वारा दूसरों के साथ सत्य का संचार करने के उद्देश्य से दिया गया था। पौलुस ने कुरिन्थुस को प्रोत्साहित किया कि: “प्रेम का अनुकरण करो, और आत्मिक वरदानों की भी धुन में रहो विशेष करके यह, कि भविष्यद्वाणी करो।” (१ कुरिन्थियों १४:१)। हालांकि, स्वर्गीय दान मांग करने पर नहीं आता है। ये केवल उन्हीं को दिया जाता है जो हृदय की दीनता में, याहुशुआ की आत्मा से भरपूर होकर उनका (याहुशुआ का) कार्य करते हैं। हर एक को एक-समान दान नहीं दिया जाता और न ही किसी ऐसे को आत्मा के दान दिया जाता है जो इसका इस्तेमाल खुद की बढ़ाई के लिए करता हो।

अन्य भाषाओं में बोलना image“वरदान तो कई प्रकार के हैं, परन्तु आत्मा एक ही है।” (१ कुरिन्थियों १२:४)

आत्मा के दान उन्हें दिए गए जिन्होंने पहले आत्मा के फलो को उजागर किया।

“आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, और कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे-ऐसे कामों के विरोध में कोई व्यवस्था नहीं।” (गलातियों ५:२२-२३)

याहुवाह, अपने बच्चों को आत्माओं के वरदान देने में प्रसन्न होते हैं। याहुशुआ ने सभी को आश्वासन दिया:

“सो जब तुम बुरे होकर अपने लड़केबालों को अच्छी वस्तुऐ देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा।” ( लूका ११:१३)

गिरती मानव जाति द्वारा प्राप्त करने की तुलना में स्वर्ग आत्माओं के वरदान प्रदान करने के लिए कहीं अधिक तैयार है।

“क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिस में न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, ओर न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।” (याकूब १:१७)

सभी जो अपने हृदय को दीन करेंगे और याहुवाह की इच्छा की पूर्ण आज्ञाकारिता की तलाश में हैं, वे आत्माओं के फलो से आशीषित होंगे। फिर, जब पिता को उनकी जरूरत पड़ती है, वह अपने बच्चों को, जो उनके लिए आवश्यक उपहार के साथ हो अपनी इच्छा को समस्त पृथ्वी पर पूरा करने के लिए पुरस्कृत करेंगे। उपासना या फिर प्रार्थना में बड़बड़ करना सिर्फ उसी की बढ़ाई करने का काम करता है जो “अन्य अन्य भाषा के दान” होने का दावा करता हो। ये किसी को भी ऊँचा उठाने में या धार्मिकता में निर्देशित नहीं करता यदि आसपास वाला समझ ही नहीं सकता हो कि क्या बोला जा रहा है। इस तरह की मूर्खता पूर्ण बड़बड़ केवल आत्मा के फलों की कमी को उजागर करती है जोकि आत्मा के वरदानों के लिए जरूरी होने चाहिए। प्रेम, धैर्य और दया खो जाती है जब कोई अतर्कसंगत बड़बड़ ध्वनियों द्वारा अपने स्वयं के महत्व को गौरव मान लेता हो। केवल वही प्रार्थना और उपासना पिता को कबूल है जो प्यार भरे हृदय से आती हो और इस तरह का हृदय पिता की आत्मा से भर जाता है।

“वह अच्छी तरह प्रार्थना करता है, जो दोनों मनुष्यों और पशु-पक्षियों से प्रेम करता है।
वह सर्वोत्तम प्रार्थना करता है, जो अच्छी तरह से सभी वस्तुओं, दोनों छोटी या बड़ी को प्रेम करता है;
प्रिय…[याह] के लिए जो हमें प्यार करता है, वह जो हमें बनाता है और सभी से प्रेम करता है।”
(शमूएल टेलर कॉलरिज)(Samuel Taylor Coleridge)

हर कोई, जो पिता की बढ़ाई करना चाहता है, उसकी जो स्वर्ग में है, जो सब जानता और देखता है, उनके नाम की बढ़ाई और सत्य तथा धार्मिकता को समस्त पृथ्वी पर फैलाने के लिए अपने दीन हृदय का इस्तेमाल करेगा।

अनंतकाल तक जलते रहने के सिद्धान्त द्वारा अधिक हृदय पीड़ा, अधिक भ्रम
उत्पन्न हुआ जिसके कारण बहुत से लोग किसी एक विश्वास की सम्भावना की अपेक्षा
यहुवाह को अस्वीकार करने के लिए निराशा में उसके चेहरे को कवर लड़कीअग्रसर हुए. यहाँ तक कि पापी मनुष्य “न्याय” के इस
विचार से घबरा जाते हैं जिसमे एकमात्र जीवन काल में किये गये पापों के
लिए असीमित अनन्तकाल तक पीड़ा की आवश्यकता दी गई है.

बाइबल का एक वचन जोकि अनन्तकाल तक जलने वाले नरक के समर्थन में अधिकतर
उपयोग किया जाता है वह प्रकाशितवाक्य में पाया जाता है:

“वह एलोहीम के प्रकोप की निरी मदिरा, जो उसके क्रोध के कटोरे में डाली
गई है, पीएगा और पवित्र स्वर्गदूतों के सामने और मेमने के सामने आग और गन्धक की
पीड़ा में पड़ेगा उनकी पीड़ा का धुआं युगानुयुग उठता रहेगा, और जो उस पशु और उसकी
मूर्ति की पूजा करते हैं, और जो उसके नाम की छाप लेते हैं, उनको रात दिन चैन न
मिलेगा.” (प्रकाशितवाक्य १४:१०,११)

पुराने नियम में “नरक” शब्द का उपयोग इकत्तीस बार किया गया है,
यह इब्रानी शब्द “Sheol” से अनुवादित किया गया है. अनन्त आग के स्थान से बहुत दूर, sheol शब्द का उपयोग साधारणत: एक स्थान या
मृतकों की दशा के सन्दर्भ में किया जाता है:

Sheol मृतकों का निवास स्थान, एक निम्न स्थान, या उन लोगों की दशा जो मर गये
या नाश हो गये है….यह एक दण्ड का स्थान समझा जाता था, लेकिन साधारण रूप में सभी
मनुष्यों का अन्तिम विश्राम स्थान समझा जाता है (उत्पत्ति ३७:३५)…… यह
पुनर्जीवित होने के बाद दण्ड के एकमात्र मार्ग के रूप में उपयोग नहीं किया जा
सकता.”
(#7585,
The New Strong’s Expanded Dictionary of Bible Words.
)

जब तक की नया नियम ग्रीक में अनुवाद नहीं किया गया था तब तक अनन्त आग
का उल्टा “नरक” की धारणा को प्रभावित करना आरम्भ नहीं किया था.

“यदि तेरी दाहिनी आँख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकलकर फेंक दे;
क्योंकि तेरे लिए भला है कि तेरे अंगों में से एक नष्ट हो जाए और तेरा सारा शरीर
नरक में न डाला जाय. यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाए, तो उसको काटकर फेंक दे;
क्योंकि तेरे लिए भला है कि तेरे अंगों में से एक नष्ट हो जाय और तेरा सारा शरीर
नरक में न डाला जाय.” (मत्ती ५:२९-३०)

नरक शब्द दस बार ग्रीक शब्द “Hades” से अनुवादित किया गया है जो साधारणतया “Sheol” के समान नाश हुओं का स्थान या दशा है.

मूर्ति और बच्चे के बलिदान का चित्रणग्यारह बार “नरक” शब्द “gĕĕnna” एक घाटी के सन्दर्भ से आता है जहाँ पतित इस्राइली लोग शिशु बलि चढ़ाया
करते थे. यह अलंकारिक रूप से “अनन्त दण्ड के एक स्थान का नाम (या दशा) के
रूप में उपयोग किया जाता है.” (#1067, The New Strong’s Expanded Dictionary of Bible Words.)

धर्मशास्त्र सिखाता है कि वे सभी जो उद्धार को अस्वीकार करते और
विद्रोही होकर पाप से चिपके रहते हैं, वे जलाए जाने द्वारा दंडित किये जाएँगे. फिर
भी इसे उन सब बातों के प्रकाश में जो बाइबल दुष्टों के दण्ड के बारे में बताती है
समझना आवश्यक है.

धर्मशास्त्र में साक्ष्यों का संचित भार
प्रगट करता है कि उनके लिए जिन्होंने उद्धार को अस्वीकार कर दिया है दण्ड स्वरूप
अनन्त मृत्यु है नाकि अनन्त जीवन.

“क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है; परन्तु [एलोहीम] का वरदान [हमारे यहुशुआ उद्धारकर्ता] में अनन्त जीवन है.”
(रोमियो ६:२३)

इस प्रकार “नरक” जैसा की धर्मशास्त्र में संदर्भित किया गया है के
द्वारा दुष्टों के द्वारा दण्ड को प्राप्त करना है जिसका अन्त उनका विनाश है.

“क्योंकि देखो, वह धधकते भट्टे का सा दिन आता है, जब सब अभिमानी और सब
दुराचारी लोग अनाज की खूंटी बन जाएँगे; और उस आने वाले दिन में वे ऐसे भस्म हो
जाएँगे कि उनका पता तक न रहेगा, सेनाओं के यहुवाह का यही वचन है. परन्तु तुम्हारे
लिए जो मेरे नाम का भय मानते हो, धर्म का सूर्य उदय होगा, और उसकी किरणों के
द्वारा तुम चंगे हो जाओगे; और तुम निकलकर पाले हुए बछड़ों के समान कूदोगे और
फांदोगे. तब तुम दुष्टों को लताड़ डालोगे अर्थात मेरे उस ठहराए हुए दिन में वे
तुम्हारे पाँवो के नीचे राख बन जाएँगे, सेनाओं के यहुवाह का यही वचन है.” (मलाकी
४:१-३)

जब एक बार दुष्ट अपने पापों की न्यायोचित क्षतिपूर्ति पा चुकेंगे,
यहुवाह कहता है की वे “जलाए जाएँगे”. जब कोई वस्तु जलाई जाती है, तब जलाने के लिए कुछ भी
बचा नहीं रह जाता है.

“देखो सभी मनुष्यों के प्राण तो मेरे हैं; जैसा पिता का प्राण, वैसा
ही पुत्र का भी प्राण; दोनों मेरे ही हैं. इसलिए जो भी प्राणी पाप करे वही मर
जाएगा.” (यहेजकेल १८:४)

इस प्रकार अनन्त मृत्यु का दण्ड
दुष्टों के लिए जिन्होंने उद्धार को ठुकरा दिया अंतिम दण्ड होगा.

क्योंकि कुकर्मी लोग काट डाले जाएँगे; . . . थोड़े दिन बीतने के बाद
दुष्ट रहेगा ही नहीं; और तू उसके स्थान को भली भांति देखने पर भी उसको न पाएगा.

. . . दुष्ट लोग नष्ट हो जाएँगे; और यहुवाह के शत्रु खेत की सुथरी घास
के समान नष्ट होंगे, वे धुंए के समान लुप्त हो जाएँगे.

यहुवाह की बाट जोहता रह, और इसके मार्ग पर बना रह, और वह तुझे बढ़ा कर
पृथ्वी का अधिकारी कर देगा; जब दुष्ट काट डाले जाएँगे तब तू देखेगा. मैंने दुष्ट
को बड़ा पराक्रमी और ऐसा फैलता हुआ देखा, जैसा कोई हरा पेड़ अपने निज भूमि पर फैलता
है. परन्तु जब कोई उधर से गया तो देखा कि वह वहाँ है ही नहीं; और मैंने उसे ढूंढा,
परन्तु कहीं न पाया. (भजन ३७:९, १०, २०, ३४-३६,)

उनसे जो हठपूर्वक अपने पाप में जुड़े रहते हैं यहुवाह कहता है:

“देख वे भूसे के समान होकर आग से भस्म हो जाएँगे; वे अपने प्राणों को
ज्वाला से न बचा सकेंगे. वह आग तापने के लिए नहीं, न ऐसी होगी जिसके सामने कोई बैठ
सके.” (यशायाह ४७:१४)

यहुशुआ के दुसरे आगमन के बाद, शैतान और उसके दुष्ट दूत इस पृथ्वी को
प्रकाशितवाक्य के अनुसार “अथाह कुण्ड” में बाँध देंगे.

“फिर मैंने एक स्वर्गदूत को स्वर्ग से उतरते देखा, जिसके हाथ में अथाह
कुण्ड की कुंजी और एक बड़ी जंजीर थी. उसने उस अजगर, अर्थात पुराने साँप को, जो
इबलीस और शैतान है. पकड़ के हजार वर्ष के लिए बाँध दिया. और उसे अथाह कुण्ड में डाल
कर बन्द कर दिया और उस पर मुहर लगा दी की वह हजार वर्ष के पुरे होने तक जाति-जाति
के लोगों को फिर न भरमाए. इसके बाद अवश्य है की वह थोड़ी देर के लिए फिर खोला जाए.”
(प्रकाशितवाक्य २०:१-३)

एक हजार वर्ष के लिए, शैतान और उसके दूत इस पृथ्वी पर बांधे जाएँगे
जबकि छुटकारा पाये हुए लोग मुक्तिदाता के साथ स्वर्ग में शासन करेंगे.

“फिर मैंने सिंहासन देखे, और उन पर लोग बैठ गए, और उनको न्याय करने का
अधिकार दिया गया. मैंने उनकी आत्माओं को भी देखा, जिनके सिर यहुशुआ की गवाही देने
और यहुवाह के वचन के कारण काटे गए थे, और जिन्होंने न उस पशु की, और न उसकी मूर्ति
की पूजा की थी, और न उसकी छाप अपने माथे और हाथों पर ली थी. वे जीवित होकर मसीह के
साथ हजार वर्ष तक राज्य करते रहे. जब तक वे हजार वर्ष पुरे न हुए तब तक शेष मरे
हुए न जी उठे. यह तो पहला पुनरुथान है धनी और पवित्र वह है, जो इस पहले पुनरुथान
के भागी हैं. ऐसों पर दूसरी मृत्यु का कुछ भी अधिकार नहीं, पर वे यहुवाह और मसीह
के याजक होंगे और उसके साथ हजार वर्ष तक राज्य करेंगे.” (प्रकाशितवाक्य २०:४-६)

स्वर्ग में मिलेनियम के समाप्त होने पर, दुष्ट लोग पृथ्वी शैतान के
साथ अपना दण्ड पाएँगे. शैतान फिर एक बार थोड़े समय के लिए, खोये हुओं को धोका देगा,
और उनको उस नये यरूशलेम के विरुद्ध जो यहुवाह पृथ्वी पर लाएगा और युद्ध के लिए
अग्रसर करेगा.

हिब्रू और ग्रीक में नर्क परिभाषाएँ“जब हजार वर्ष पुरे हो चुकेंगे तो शैतान कैद से छोड़ दिया जाएगा. वह उन
जातियों को जो पृथ्वी के चारों ओर होंगी, अर्थात गोग और मागोग को जिनकी गिनती
समुद्र की बालू के बराबर होगी, भरमाकर लड़ाई के लिए इकठ्ठा करने को निकलेगा. वे
सारी पृथ्वी पर फ़ैल कर पवित्र लोगों की छावनी और प्रिय नगर को घेर लेंगी; और आग
स्वर्ग से उतरकर उन्हें भस्म करेगी. उन का भरमाने वाला शैतान आग और गन्धक की उस
झील में, जिसमें वह पशु और झूठा भविष्यवक्ता भी होगा, डाल दिया जाएगा; औए वे रात
दिन युगानुयुग पीड़ा में तड़पते रहेंगे.” (प्रकाशितवाक्य २०:७-१०)

अंग्रेजी शब्द “forever and ever” ग्रीक शब्द aiōn.” [ahee-ohn’] से
अनुवादित किये गये हैं जिसका अर्थ:

“ ‘एक आयु, युग’ और यह एक अनिश्चित अवधि के चक्र या उस समय को जिसमे
चक्र पूरा होते देखा जाता है प्रगट करता है. इस शब्द के साथ यह बहुत अधिक जोर नहीं
दिया गया है कि चक्र की वास्तविक अवधि ही हो, लेकिन यह एक चक्र है जो आत्मिक या
नैतिक अभिलक्षण द्वारा चिन्हित किये गये हैं. . . इस शब्द के साथ जुड़े हुए
वाक्यांश का शाब्दिक अनुवाद नहीं होना चाहिए, परन्तु लगातार इसके इस आशय के साथ की
अनिश्चित अवधि. (#165,
The New Strong’s Expanded Dictionary of Bible Words.)

मात्र इसलिए कि वाक्यांश समय की एक अनिश्चित अवधि को सन्दर्भित करता
है, यह अर्थ नहीं है कि समय की अवधि सदा के लिए बिना समाप्त हुए बढ़ती रहेगी. बाइबल
स्पष्ट रूप से प्रगट करती है कि शैतान और खोये हुओं के दण्ड का एक अन्त है, उसके
बाद वे शेष नहीं रहेंगे.

“तेरे अधर्म के कामों की बहुतायत से और तेरे लेन-देन की कुटिलता से
तेरे पवित्र स्थान अपवित्र हो गये हैं; इसलिए मैंने तुझ में से ऐसी आग उत्पन्न की
जिससे तू भस्म हुआ, और मैंने तुझे सब देखने वालों के सामने भूमि पर भस्म कर डाला
है. देश देश के लोगों में से जितने तुझे जानते हैं सब तेरे कारण विस्मित हुए; तू
भय का कारण हुआ है और फिर कभी पाया न जाएगा.” (यहेजकेल २८:१८-१९)

राख जलती नहीं है. बल्कि, राख उस वस्तु का गौण उत्पाद है जिसका जलना
पूरा हो गया. यह ही अन्त है, अनन्त मृत्यु, जिसका सन्दर्भ यहुशुआ के द्वारा
भी किया गया जब उसने कहा:

“ जो शरीर को घात, पर आत्मा को घात नहीं कर सकते, उनसे मत डरना; पर
उसी से डरो जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में नष्ट कर सकता है.” (मत्ती १०:२८)

आग की झील जो अंततः पाप और पापियों को नाश करती है, वह मृत्यु को भी
स्वत: नाश करती है:

“फिर मैंने छोटे बड़े सब मरे हुओं को सिंहासन के सामने खड़े देखा, और
पुस्तकें खोली गईं; और फिर एक और पुस्तक खोली गई, अर्थात जीवन की पुस्तक; और जैसा
उन पुस्तकों में लिखा हुआ था, वैसे ही उनके कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय
किया गया. समुद्र ने उन मरे हुओं को जो उसमे थे दे दिया, और मृत्यु और अधोलोक ने
उन मरे हुओं को जो उनमें थे दे दिया; और उनमें से हर एक के कामों के अनुसार उनका
न्याय किया गया. मृत्यु और अधोलोक आग की झील में डाले गये. यह आग झील दूसरी मृत्यु
है; और जिस किसी का नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ न मिला, वह आग की झील में
डाला गया.” (प्रकाशितवाक्य २०:१२-१५)

मानव जाति का मृत्यु की शक्ति से उद्धार ही मुक्तिदाता के मिशन का
सम्पूर्ण उद्देश्य था. उसके शिशु रूप में जन्म लेने के बहुत पहले ही उसके लिए एक
भविष्यवाणी की गई:

“मैं उसको अधोलोक के वश से छुड़ा लूँगा और मृत्यु से उसको छुटकारा
दूँगा. हे मृत्यु तेरी मरने की शक्ति कहाँ रही? हे अधोलोक, तेरी नष्ट करने की
शक्ति कहाँ रही? मैं फिर कभी नहीं पछताऊंगा. (होशे १३:१४)

पहली बार हाबिल की मृत्यु के समय आदम और हव्वा के शोक से लेकर
विश्वासी हृदयों में पाप, शैतान और यहाँ तक कि मृत्यु का नाश केंद्र बिंदु रहा है.
पुनर्जीवित धर्मी आनन्द से चिल्लायेंगे:

“जय ने मृत्यु को निगल लिया. हे मृत्यु तेरी जय कहाँ रही? हे मृत्यु
तेरा डंक कहाँ रहा?” ( १कुरन्थियो १५:५४,५५)

आग जो पाप और पापी को नाश करती है पृथ्वी को भी शुद्ध करती है:

“परन्तु [यहुवाह] का दिन चोर के समान आ जाएगा, उस दिन आकाश बड़ी
हडबडाहट के शब्द से जाता रहेगा और तत्व बहुत ही तप्त होकर पिधल जाएँगे और पृथ्वी
और उस पर के काम जल जाएँगे.” (२पतरस ३:१०)

सृष्टिकर्ता भी पुन:-सृष्टिकर्ता होगा. एक बार जब पृथ्वी पाप के
अन्तिम चिन्ह से भी साफ़ हो जाएगी, यहुवाह एक नया स्वर्ग और एक नई पृथ्वी बनाएगा.

“आदि में तूने पृथ्वी की नीव डाली, और आकाश तेरे हाथों का बनाया हुआ
है. वह तो नष्ट होगा, परन्तु तू बना रहेगा, और वह सब कपड़े के समान पुराना हो
जाएगा. तू उनको वस्त्र के समान बदलेगा, और वह बदल जाएगा , परन्तु तू वही है, और
तेरे वर्षों का अन्त नहीं होने का.” (भजन १०२:२५-२७)

वह आग जो दुष्टों को नाश करती है पृथ्वी को शुद्ध करती है. शाप के
प्रत्येक चिन्ह मिटा दिए गये. पाप के डरावने परिणाम बंधन मुक्ति के पहले अनन्त काल
तक जलने वाला नरक नहीं रखा जाएगा.

केवल एक अनुस्मारक शेष रहेगा: हमारा छुटकारा देने वाला क्रूस पर दिए
गये घावों को हमेशा धारण किये रहेगा. उसका जख्मी सिर, बाजू, उसके हाथ और पैर ही
मात्र चिन्ह हैं जो पाप के द्वारा गढ़े गये हैं. (E. G. White, The Great Controversy, p. 674.)

आनन्द लड़कीयह पृथ्वी, क्लेश, संघर्ष, और पीड़ा का दृश्य छुटकारा पाए हुओं का
अनन्त निवास होगा.

“पर उसकी प्रतिज्ञा के अनुसार हम एक नये आकाश और नई पृथ्वी की आस
देखते हैं जिनमे धार्मिकता वास करेगी.” (२ पतरस ३:१३)

बचाए हुओं का आनन्द यहुवाह की उपस्थिति होगी जो, अनन्त काल तक कभी न
रुकने वाले चक्र के द्वारा उनके साथ वास करेगा जो, विश्वास के द्वारा मेमने के
छुटकारा देने वाले लहू में, पाप और अनन्त मृत्यु से बचाए गये हैं.

“फिर मैंने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहला आकाश और
पहली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा. फिर मैंने पवित्र नये यरूशलेम को
स्वर्ग से [यहुवाह] के पास से उतरते देखा. वह उस दुल्हिन के समान थी जो अपने पति
के लिए श्रृंगार किये हो. फिर मैंने सिंहासन में से किसी को ऊँचे शब्द से यह कहते
हुए सुना, ‘देख [यहुवाह] का डेरा मनुष्यों के बीच में है. वह उनके साथ डेरा करेगा,
और वे उसके लोग होंगे, और [एलोहीम] आप उनके साथ रहेगा और उनका [एलोहीम] होगा. वह
उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और उसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न
विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रही.” (प्रकाशितवाक्य २१:१-४)

यहुवाह कभी भी किसी को अनन्त वेदना की दण्ड आज्ञा नहीं देगा. उसके
शत्रुओं के लिए उसका दण्ड न्यायोचित है नाकि प्रतिशोधात्मक.

“क्योंकि यहुवाह ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र
दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नष्ट न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए.
यहुवाह ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे,
परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए.” (यहुन्ना ३:१६-१७)

शेष स्वर्गीय पिता के ज्ञान में आपके लिए उसका प्रेम है. वह उन सभी को
जो उसके पास विश्वास में आते है बचायगा.